उल्फा प्रमुख नई दिल्ली में, बातचीत की संभावना बढ़ी (राउंडअप)
गुवाहाटी, 3 दिसम्बर (आईएएनएस)। प्रतिबंधित संगठन युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) का संस्थापक एवं अध्यक्ष अरविंद राजखोवा अब भारत सरकार के कब्जे में है और उसे संभवत: दिल्ली की एक सैन्य छावनी में रखा गया है।
यहां एक संवाददाता सम्मेलन में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि राजखोवा के बारे में 'एक बड़ी सफलता' हाथ लगी है और अगले कुछ दिनों या घंटों में इस बारे में पता चल जाएगा। उन्होंने हालांकि राजखोवा की गिरफ्तारी की पुष्टि नहीं की।
उन्होंने कहा, "मैं यह नहीं कह सकता कि यह सफलता कैसे मिली, लेकिन एक सफलता मिल चुकी है और अगले कुछ दिनों या घंटों में ही राजखोवा के बारे में आपको पता चल जाएगा।"
उन्होंने कहा, "हमें पूरी उम्मीद है कि जल्द ही कुछ अच्छी खबर मिलेगी और प्रगति सही दिशा में चल रही है। संकेत उत्साहजनक हैं।"
खुफिया अधिकारियों ने बुधवार को दावा किया था कि बांग्लादेश से पकड़े गए राजखोवा को बांग्लादेशी अधिकारियों ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के हवाले कर दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा, "मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि उल्फा जब सरकार के साथ बातचीत करे तो वह अपनी संप्रभुता की मांग छोड़ कर किसी भी मुद्दे पर चर्चा कर सकता है।"
उन्होंने कहा, "अगर वार्ता में प्रगति होती है तो हम कुछ भी करने को तैयार हैं यहां तक कि शांति प्रक्रिया की राह को आसान बनाने के लिए उल्फा के नेताओं को जेल से रिहा भी किया जा सकता है।"
इस बीच यह भी संकेत मिल रहे हैं कि केंद्र सरकार राजखोवा के पकड़े जाने को गिरफ्तारी का नाम देने के बजाय आगामी शांति वार्ता के मद्देनजर उसे सुरक्षित रास्ता दे सकती है।
इस पर गोगोई ने कहा, "अगर वे सुरक्षित रास्ता चाहते हैं तो हम देने के लिए तैयार हैं। इन सभी मसलों पर चर्चा हो सकती है और इस पर पहल भी जा सकती है।"
खुफिया विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बुधवार रात को राजखोवा को दिल्ली ले जाया गया और संभवत: उसे किसी सैन्य छावनी मे रखा गया है।
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम के बुधवार को राज्यसभा में दिए एक बयान से स्पष्ट हो गया कि सरकार पहले से ही उल्फा के संपर्क में थी। चिदंबरम ने कहा था कि उल्फा नेतृत्व अगले दो दिनों में एक राजनीतिक बयान जारी करेगा।
इधर, राजखोवा की गिरफ्तारी खबरों को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया आने लगी है। उल्फा के शांति वार्ता के पक्षधर धड़े के नेता मृणाल हजारिका ने कहा, "हम आशा करते हैं कि अब राजखोवा शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएंगे। अगर सरकार के साथ बातचीत के लिए वह तैयार होते हैं तो हम सभी उनके साथ हैं।"
हजारिका के साथ उल्फा के 28वीं बटालियन के चार्ली और अल्फा कंपनियों के करीब 150 विद्रोहियों ने जुलाई में आत्म समर्पण कर दिया था।
अल्फा और चार्ली कंपनियां उल्फा की सबसे ताकतवर कंपनियां हैं।
यद्यपि, जेल में बंद उल्फा के कुछ नेताओं ने गुरुवार को कहा कि संगठन के कमांडर इन चीफ परेश बरुआ के बिना बातचीत के इच्छित परिणाा नहीं निकलेंगे।
उल्फा के पूर्व प्रचार प्रमुख मिथिंगा दैमरी ने कहा ,"परेश बरुआ के बिना बातचीत का कोई मतलब नहीं है। अरविंद राजखोवा अकेले असम में स्थायी शांति नहीं ला सकते।"
बातचीत का विरोध परेश बरुआ माना जा रहा है कि चार माह पहले उसने बांग्लादेश छोड़ दिया और अब वह चीन-म्यांमार की सीमा पर कहीं छिपा हुआ है।
पिछले 30 सालों से राजखोवा पहेली बना हुआ था। उसने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा विभिन्न छद्म नामों से विदेशों में बिताया।
कक्षा 12वीं पास राजखोवा हमेशा उल्फा के उदारवादी चेहरे के रूप में देखा जाता रहा है और वह उग्रवाद की समस्या के राजनीतिक समाधान की बात अक्सर करता रहा है, जबकि परेश बरुआ ठीक इसके विपरीत बातें करता रहा है।
उल्फा के बातचीत समर्थक धड़े के नेता मृणाल हजारिका ने आईएएनएस से कहा, "निश्चित रूप से यह उल्फा के लिए करारा झटका होगा, यद्यपि हम अभी इस खबर की औपचारिक पुष्टि नहीं कर पाए हैं। लेकिन फिलहाल जो स्थिति है, उससे लगता है कि यह घटना सच हो सकती है।"
दूसरी ओर चर्चित असमी लेखिका इंदिरा गोस्वामी ने कहा है कि राजखोवा की गिरफ्तारी भर से असम में शांति नहीं आ सकती।
राजखोवा ने अपने पांच अन्य साथियों के साथ मिलकर 1979 में उल्फा की स्थापना की थी। संगठन को खड़ा करने में इसके सुप्रीम कमांडर परेश बरुआ की खास भूमिका रही थी।
सूत्रों ने बताया कि बांग्लादेश सरकार अपनी सरजमीं से भारत विरोधी गतिविधियों पर पूर्ण अंकुश लगाने को लेकर गंभीर है। पिछले महीने बांग्लादेश ने दो प्रमुख उल्फा नेताओं, सशा चौधरी एवं चित्रबोन हजारिका को गिरफ्तार कर भारत के हवाले कर दिया था। बताया जाता है कि सरकार के दबाव में ही परेश बरुआ को बांग्लादेश छोड़कर चीन में पनाह लेनी पड़ी है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications