'बुद्धदेव बात पर कायम हैं, पर ममता..?'

'बुद्धदेव बात पर कायम हैं, पर ममता..?'

दिल्ली से भुवनेश्वर जा रही राजधानी एक्सप्रेस के पश्चिम बंगाल में नक्सलियों द्वारा घंटों रोके जाने और ड्राइवर के अपहरण की घटना का प्रकरण राज्य की राजनीति और नक्सलियों के ख़िलाफ़ भारत की केंद्र सरकार की रणनीति के बारे में क्या दर्शाता है.

बीबीसी के कोलकाता संवाददाता सुबीर भौमिक का आकलन: इस पूरे प्रकरण से कई सवाल उपजे हैं और राज्य की राजनीति भी गरमा गई है.

नक्सलियों ने मंगलवार दोपहर को पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में ट्रेन को रोका था, जिसे बाद में सुरक्षाकर्मियों ने रिहा कराया.

हाल में पश्चिम बंगाल में एक पुलिस अधिकारी के अपहरण और फिर पुलिस-माओवादी वार्ता और कुछ गिरफ़्तार माओवादी कार्यकर्ताओं की रिहाई के बाद उस पुलिस अधिकारी को माओवादियों ने रिहा किया था.

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने इस घटना के बाद कहा था कि वह केवल एक घटना थी और उसे राज्य सरकार की नीति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ये भी कहा था कि यदि ऐसी स्थिति दोबारा पैदा होती है तो सरकार माओवादियों से कोई समझौता नहीं करेगी.

वे अपनी बात पर कायम रहे हैं. इससे ये संकेत भी मिला है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय माओवादियों के ख़िलाफ़ जिस अभियान की तैयारी कर रहा है उसमें राज्य सरकार भी केंद्रीय सुरक्षा बलों का साथ दे सकती है.

अब ऐसा प्रतीत होता है कि वे इस समस्या को क़ानून-व्यवस्था की समस्या के तौर पर देख रहे हैं लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पुलिस का मनोबल गिरेगा.

जब सशस्त्र आंदोलन पर चलने की बात कर रहे पीसीपीए संगठन ने मंगलवार को अपनी माँगों की बात की तो मुख्यमंत्री बुद्धदेव ने इससे साफ़ इनकार कर दिया. यह स्वभाविक था कि पिछली बार के पुलिस अधिकारी के अपहरण के प्रकरण के नतीजे में कुछ ऐसी घटनाओं के भविष्य में होने और नक्सलियों के बातचीत और समझौते की आशा लगाने की सभावना थी.

जहाँ केंद्र सरकार, ग्रह मंत्री पी चिदंबरम और पश्चिम बंगाल सरकार एक ही सुर में बोलते नज़र आ रहे हैं वहीं त्रिणमूल कांग्रेस नेता और रेल मंत्री ममता बनर्जी कभी कुछ और कभी कुछ बोलती दिख रही हैं.

जब मंगलवार दोपहर ये घटना हुई तो भारतीय समयानुसार 1730 तक ममता बनर्जी की ओर से कहा जा रहा था कि ये कोई नक्सली घटना नहीं है बल्कि ये मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ही कोई कार्यकर्ताओं की चाल है. इसके बाद भारतीय समयानुसार 1830 पर वे नक्सलियों से अपील करती नज़र आईं कि वे ट्रेन को छोड़ दें.

ये स्पष्ट है कि इतने समय तक ट्रेन को रोके रखना और फिर लगभग तीन घंटे तक सशस्त्र लोगों और सुरक्षाकर्मियों के बीच गोलीबारी होना दिखता है कि ज़रुरी किसी हद तक नक्सलियों का इस घटना के साथ संबंध था.

नक्सलियों के अलावा किसी और संगठन के पास इतना असला या बल नहीं है कि वह सुरक्षाकर्मियों का सामना कर पाए. जहाँ तक राज्य की राजनीति का सवाल है तो वाम मोर्चे और त्रिणमूल के बीच वाकयुद्ध बढ़ेगा.

त्रिणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने माओवादियों से बातचीत की वकालत की थी और यहाँ तक कहा था कि माओवादी नेता किशनजी के साथ बाताचीत को बढ़ाया जाए.

इसका माक्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर सकता है क्योंकि वाम मोर्च पहले से आरोप लगाता आया है त्रिणमूल की नक्सलियों से साथ सांठगांठ है.

उधर ममता बनर्जी का तर्क अब ये होगा कि पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में क़ानून व्यवस्था है ही नहीं इसीलिए इस तरह केी घटनाएँ संभव है. त्रिणमूल कांग्रेस पहले से माँग करती आई है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन कायम हो.

इस तरह माओवादियों या नक्सलियों का सामना करने मसले पर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य केंद्र सरकार और गृह मंत्री पी चिदंबरम के साथ खड़े नज़र आते हैं और कड़ी सुरक्षा कार्रवाई के पक्ष में दिखाई देते हैं. लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में चिदंबरम की साथी रेल मंत्री ममता बनर्जी कुछ अलग रुख़ अपनाती हुई नज़र आ रही है.

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