रिलायंस गैस विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने किए कई सवाल

प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन, न्यायाधीश आर. वी. रवींद्रन और न्यायाधीश पी. सथशिवम की खंडपीठ ने कहा, "एक संतोषजनक सुलह तक पहुंचने के लिए आप क्यों नहीं मध्यस्थ या किसी तीसरे पक्ष का सहारा ले रहे हैं।" इस चर्चित मामले की सुनवाई के दूसरे दिन अदालत ने कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज का बंटवारा इस कल्पना पर आधारित था कि रिलायंस इंडस्ट्रीज कृष्णा-गोदावरी बेसिन से रिलायंस नेचुरल को गैस की आपूर्ति करेगी।
खंडपीठ ने वर्ष 2005 में रिलायंस समूह के बंटवारे का हवाला देते हुए पूछा, "क्या एक उपयुक्त गैस आपूर्ति समझौते की बात नहीं कही गई थी?" अदालत ने कहा, "आप नहीं कह सकते कि यदि कोई उपयुक्त समझौता नहीं है तो कोई उपयुक्त समझौता हो ही नहीं सकता।" अदालत ने आगे कहा, "अगर कोई उपयुक्त समझौता नहीं है तो क्या होगा? यदि समझौता उपयुक्त नहीं है तो क्या बंटवारा विफल नहीं होगा?"
अकेले रिलायंस इंडस्ट्रीज नहीं ले सकती फैसला
खंडपीठ ने यह भी कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज अकेले गैस आपूर्ति समझौते के 'उपयुक्त' होने के बारे में फैसला नहीं ले सकती। न्यायाधीशों ने विवाद को सुलझाने के लिए तीसरे पक्ष या किसी बाहरी हस्तक्षेप की सलाह दी। खंडपीठ ये टिप्पणी रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से अदालत में उपस्थित वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे द्वारा रिलायंस नेचुरल की याचिका का विरोध करने और उसे न तो शेयरधारक और न ही ऋणदाता करार दिए जाने के बाद की।
साल्वे ने यह भी कहा कि उनके मुवक्किल (रिलायंस इंडस्ट्रीज) का मानना है कि गैस के उपयोग और कीमत के बारे में सरकार की नीति एक उपयुक्त समझौता हो सकती है। लेकिन खंडपीठ ने कहा, "रिलायंस नेचुरल 'एक तीसरा पक्ष नहीं है' और यह बंटवारे से पूर्व आपका हिस्सा था।" इसके बाद खंडपीठ साल्वे की दलील सुनता रहा। साल्वे ने इससे पहले कहा था कि उनकी दलील अगले सप्ताह बुधवार या गुरुवार तक जारी रहेगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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