सभी द्वादश ज्यार्तिलिंगों से भिन्न है बैद्यनाथधाम
पंचशूल के विषय में धर्म के जानकारों का अलग-अलग मत है। बैद्यनाथधाम मंदिर के प्रांगण में वैसे तो विभिन्न देवी-देवताओं के 22 मंदिर हैं परंतु मध्य में स्थित शिव का भव्य और विशाल मंदिर कब और किसने बनाया यह अभी भी शोध का विषय माना जाता है।
पंचशूल के विषय में मान्यता है कि यह त्रेता युग में रावण की लंका के बाहर सुरक्षा कवच के रूप में स्थापित था। उल्लेखनीय है कि धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक भगवान विष्णु ने एक ग्वाले के वेश में रावण से कैलाश से लंका ले जाते हुए इस शिवलिंग को लेकर यहां स्थपित किया था।
मंदिर के पुरोहित दुर्लभ मिश्रा के मुताबिक धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि रावण को पंचशूल का सुरक्षा कवच भेदना आता था जबकि इस कवच को भेदना भगवान राम के भी वश में भी नहीं था। विभीषण द्वारा बताई गई उक्ति के बाद ही राम और उनकी सेना लंका में प्रवेश कर सकी थी। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि आज तक इस मंदिर पर किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ है।
इधर, धर्म के जानकार पंडित सूर्यमणि परिहस्त का कहना है कि पंचशूल काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा ईष्र्या जैसे पांच शूलों से मुक्त होने का प्रतीक है, जबकि पंडित कामेश्वर मिश्र ने इसे पंचतत्वों क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीरा से बने शरीर का द्योतक बताया।
मंदिर के पंडों के मुताबिक मुख्य मंदिर में स्वर्णकलश के उपर स्थापित पंचशूल सहित यहां के सभी 22 मंदिरों में स्थापित पंचशूलों को वर्ष में एक बार शिवरात्रि के दिन नीचे लाया जाता है तथा सभी को एक निश्चित स्थान पर रखकर विशेष पूजा अर्चना कर पुन: वहीं स्थापित कर दिया जाता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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