श्रीलंका में 25 वर्षो बाद अंत के कगार पर पहुंचा लिट्टे

नई दिल्ली, 28 जनवरी (आईएएनएस)। श्रीलंका में लगभग 25 वर्षो से लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के रूप में दहशत के जो घने काले बादल छाए हुए थे वे अब लगभग छट गए हैं।

आज से महज सात साल पहले की बात है जब उत्तरी श्रीलंका में लिट्टे और उसके सरगना वेलुपिल्लई प्रभाकरन की जय-जयकार हो रही थी। आलम यह था कि कोलंबो में बैठा सरकारी तंत्र भी सहमा हुआ सा था।

अब हालात बदल चुके हैं। आज के समय में सभी के जेहन में एक सवाल कौंध रहा है कि आखिर लिट्टे का सरगना कहां गया। कहा यह भी जा रहा है कि 54 वर्षीय प्रभाकरन अपने परिवार के साथ बंकरों में छिपता फिर रहा है। हालांकि उसकी सुरक्षा की खातिर उसके कई साथी अभी मर मिटने को तैयार हैं।

प्रभाकरन के सहयोगी रहे धर्मालिंगम सिद्धार्थन ने आईएएनएस से कहा, " हमने तमिल हितों के लिए हथियार उठाए थे। अभी हम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। इतना जरूर है कि थोड़ा कमजोर हुए हैं। तमिल विद्रोहियों के कमजोर पड़ने का जिम्मेदार प्रभाकरन है। वह इस समय भी तमिल लोगों की एक मात्र आवाज बनना चाहता है जबकि कई लोग उससे असहमत हैं।"

उन्होंनें कहा कि वर्षो से चले आ रहे खून-खराबे से लोग तंग आ चुके हैं। यह लिट्टे के अंत की शुरुआत है। अब तमिल विद्रोही अपनी खोई हुई जमीन कभी भी वापस नहीं ले सकेंगे।

सिद्धार्थन की बात से मानवाधिकार कार्यकर्ता राजन हूले भी सहमत दिखे। उनका कहना है, "आज के समय में तमिल विद्रोहियों से सभी को खतरा है। तमिल संघर्ष को लिट्टे ने बंधक बनाने का काम किया है।"

सूत्रों का कहना है कि मुल्लैतिवु के 300 वर्ग किलोमीटर भूखंड पर अभी भी तमिल विद्रोहियों का कब्जा है। इसमें एक बड़ा हिस्सा जंगलों का है। मौजूदा समय में लिट्टे के पास तकरीबन 2,000 छापामार लड़ाके हैं।

उधर, श्रीलंकाई सेना का दावा है कि उसने मुल्लैतिवु में तमिल व्रिदोहियों के कब्जे वाले भू-भाग को भी घेर लिया है लेकिन वहां आम नागरिकों के फंसे होने की खबर है।

सरकार का लक्ष्य है कि तमिल व्रिदोहियों के कब्जे वाले क्षेत्र में सभी तरह की आपूर्ति काट दी जाए जिससे वे लाचार हो जाएंगे। सरकार का मानना है कि भोजन, दवाओं और हथियारों की नईआपूर्ति न होने की स्थिति में तमिल विद्रोही घुटने टेकने पर विवश हो जाएंगे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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