'बम धमाके हमारी नियति का हिस्सा बन गए हैं'

अजरा रहमान

गुवाहाटी, 5 जनवरी(आईएएनएस)। ऐसे में जब लोग वर्ष 2008 की विदाई और नए साल के स्वागत में मशगूल थे, गुवहाटी की खुशियों को जैसे नजर लग गई और शहर तीन बम धमाकों से थर्रा उठा। इस त्रासदी के बावजूद अगले दिन पहले की तरह की गहमागहमी देखी गई। लोग अब ऐसी वारदातों के आदी हो गए हैं।

असम के लोग बम धमाकों और फायरिंग को अपनी नियति का हिस्सा माने चुके हैं। एक टेलीकॉम कंपनी में काम करने वाले राशिद अहमद ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "आखिर आप कब तक बम धमाकों की बहस में उलझे रहेंगे? हम कब तक खौफजदा होकर घरों में दुबके रहेंगे? एक सीमा के बाद लोग ऐसी वारदातों को सहने के आदी हो जाते हैं।"

एक स्कूली शिक्षिका अशिमा बरुआ ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "हर समय कहीं न कहीं कुछ होता रहता है। खूनखराबा हमारी नियति बन गया है। जब कभी धमाका होता है तो यह सोचकर कांपने लगती हूं कि कहीं मेरा कोई संबंधी तो इसका शिकार नहीं हो गया।"

कई लोगों का मानना है लाख प्रशासनिक सख्ती व चुस्ती के बावजूद आतंकवादी अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हैं, क्योंकि सरकार की कथनी और करनी में फर्क है। अब लोग ऐसी त्रासदी के मुताबिक खुद को ढालना ही एक विकल्प मानते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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