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देश में हर 3 मिनट में एक महिला बनती है हिंसा की शिकार

By Staff
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नई दिल्ली, 25 दिसम्बर (आईएएनएस)। देश में हर तीन मिनट में कोई महिला कहीं न कहीं हिंसा की शिकार की होती है। इनमें सबसे ज्यादा मामले पति और ससुराल वालों द्वारा उत्पीड़न के होते हैं।

वर्ष 2007 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 12.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई और कुल 1,85,312 मामले दर्ज हुए जबकि वर्ष 2006 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के 1,64,765 मामले दर्ज हुए थे।

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या पिछले पांच वर्षो से लगातार बढ़ रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट 'क्राइम इन 2007' के अनुसार वर्ष 2007 में महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध आंध्रप्रदेश में दर्ज हुए।

घर भी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रहे हैं। पिछले वर्ष 75,930 महिलाएं अपने पति या ससुराल वालों की यातनाओं और क्रूरता का शिकार बनीं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सबसे ज्यादा मामले इसी तरह के हैं।

महिला अधिकारों की कार्यकर्ता रंजना कुमारी ने आईएएनएस को बताया, "ये हमारे समाज में अव्यवस्थित हो रहे सामाजिक संबंधों दर्शाता है। दूसरी ओर हमारी सरकारी एजेंसियां भी अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रही हैं और हमारे कानून हिफाजत करने की बजाए अपराधियों को साफ बच निकलने का अवसर दे रहे हैं।"

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च नाम के एक स्वयंसेवी संगठन के अनुसार परिवारों में बढ़ते असंतोष की वजह दंपत्तियों में जीवन के उच्च मानकों की उत्कंठा है।

कुमारी के अनुसार, "वैश्वीकरण की वजह से हमारे नजरिए में बहुत बदलाव आया है। हम बचत की संस्कृति से व्यय की संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं।"

देश वर्ष 2007 में बलात्कार के 20,771 मामले दर्ज हुए। इनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में अपराधी पीड़िताओं के पूर्व परिचित थे। बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए।

महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों के बावजूद राष्ट्रीय महिला आयोग का मानना है कि घरेलू हिंसा से निपटने के लिए बने कानून, दहेज विरोधी कानून और भारतीय दंड संहिता की विविध धाराएं महिलाओं को संरक्षण और कानूनी राहत प्रदान करने के लिए आवश्यक विधायी उपाय हैं।

आयोग की सदस्य यासमीन अबरार का कहना है, "कानून महिलाओं की हिफाजत में कारगर भूमिका निभा सकते हैं लेकिन जागरूकता की कमी महिलाओं के खिलाफ अपराधों की बढ़ती संख्या के लिए जिम्मेदार है। इन मसलों से निपटने के लिए हमारे समाज की सोच में व्यापक बदलाव लाने की जरूरत है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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