सस्ता चावल है प्रमुख चुनावी नारा

और इन नारों-वायदों के केंद्र में दिख रहा है सस्ता चावल और किसानों को बिना ब्याज का ऋण.
एक ओर कांग्रेस चुनौती दे रही है कि भाजपा ने तीन रुपए किलो चावल देने का वादा तो किया है लेकिन यह लोगों तक पहुँचा ही नहीं और इसमें जमकर भ्रष्टाचार हुआ है.
उधर भाजपा ने कांग्रेस को ललकारा है कि अगर वह सस्ते चावल को लेकर गंभीर है तो केंद्र सरकार की ओर से पूरे देश में दस रुपए किलो चावल देने की घोषणा कर दे.
इन नारों-वायदों के बीच फ़ैसला लेने से पहले मतदाता दोनों दलों को तौल रहा है.
चावल और किसानों को ऋण
छत्तीसगढ़ में चावल की राजनीति सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने इस साल जनवरी से शुरु की जब उसने ग़रीबी रेखा से नीचे के सभी कार्डधारियों को तीन रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से प्रतिमाह 35 रुपए किलो चावल देने का वादा किया.
और यह सिर्फ़ वादा नहीं रहा इस पर अमल भी शुरु हो गया.
सरकार का दावा है कि वो 36 लाख परिवारों को तीन रुपए किलो में चावल उपलब्ध करवा रही है.
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चुनाव आए तो इन दोनों विषयों पर राजनीति तेज़ हो गई और कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में ग़रीबों को दो रुपए किलो चावल देने और किसानों को ब्याज मुक्त ऋण देने की घोषणा कर दी.
कांग्रेस के प्रवक्ता राजेंद्र तिवारी ने बीबीसी से कहा, "हमारे घोषणा पत्र में समाज के सभी वर्गों को समाहित करने का काम किया गया है. भाजपा तीन रुपए किलो चावल दे रही है और हमारी सरकार बनेगी तो हम ग़रीबों को दो रुपए किलो चावल देंगे."
लेकिन कांग्रेस की इस घोषणा से घबराई भाजपा ने फिर एक बार राजनीतिक चाल चली और फिर से सरकार बनने पर एक रुपए किलो की दर से चावल देने की घोषणा कर दी.
इसके अलावा भाजपा नेताओं का दावा है कि किसानों को ब्याज मुक्त ऋण देने की घोषणा उन्होंने पहले की थी.
भाजपा सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहते हैं, "महाराष्ट्र और आंध्र में कांग्रेस की सरकार है अगर कांग्रेस ग़रीबों को लेकर इतनी ही गंभीर है तो उसे इन राज्यों में भी दो रुपए किलो चावल देने की घोषणा करनी चाहिए. और मैं कहता हूँ कि वो तो पूरे देश की सत्ता पर बैठे हैं अगर कांग्रेस में दम है तो केंद्र सरकार को एपीएल (ग़रीबी रेखा के ऊपर) के लोगों को दस रुपए किलो चावल देने की घोषणा कर देनी चाहिए."
उनका कहना है, "जिस कांग्रेस की सरकार ने एपीएल के लोगों को चावल देना बंद कर दिया है उसे दो रुपए किलो में चावल देने की बात बंद कर देनी चाहिए."
लेकिन कांग्रेस इस चुनौती से घबराई हुई नहीं है. वह राज्य में प्रचार कर रही है कि तीन रुपए किलो चावल देने के मामले में भाजपा सरकार ने बड़ी धाँधली की है.
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हालांकि भाजपा चावल घोटालों के इन आरोप को आधारहीन बताती है.
लेकिन धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में चावल को लेकर इतनी राजनीति क्यों हो रही है?
इस सवाल पर बृजमोहन अग्रवाल कहते हैं, "दरअसल छत्तीसगढ़ में धान की खेती घाटे का सौदा है और यहाँ 75 प्रतिशत सीमांत किसान हैं जो अपने खाने के लायक ही चावल पैदा कर पाते हैं."
मतदाता भ्रमित
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है
ऐसा नहीं है कि चावल ने भाजपा और कांग्रेस को ही लुभाया है. छोटी राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने घोषणा पत्र में इसी तरह का आश्वासन दिया है.
जहाँ तक मतदाताओं का सवाल है तो वह भाजपा और कांग्रेस के इन चुनावी नारों-वायदों को देख-परख रहा है और एक तरह से भ्रमित दिखता है.
उसे समय में नहीं आ रहा है कि आख़िर हो क्या रहा है.
मतदाता तौल रहा है कि आख़िर उन्हें क्या मिलने जा रहा है और कौन देने जा रहा है.
रायपुर के पास बरोदा गाँव के रहने वाले सनत कुमार मन्नाडे कहते हैं, "चुनाव के समय हरेक बोलता है कि यह देंगे वह देंगे. अब करेगा या नहीं यह देख रहे हैं."
भाजपा सरकार के बारे में उन्होंने कहा, "उन्होंने थोड़ा तो दिया है."
एक और मतदाता ने कहा, "कई लोग बोलते हैं और करते नहीं हैं. कुछ को बिना बोले भी बहुत कुछ कर देते हैं. राजनीति के समय तो यह सब होता रहता है."
अब नतीजे ही बताएँगे कि चावल और किसानों को ब्याज मुक्त ऋण के वायदों से किस पार्टी ने ज़्यादा मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता पाई.












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