मरीज का उपचार से इंकर चिकित्सा आचार संहिता का उल्लंघन : बालाकृष्णन

भोपाल, 14 सितंबर (आईएएनएस)। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश क़े जी़ बालाकृष्णन ने कहा है कि अस्पतालों में संसाधनों की कमी की आड़ में कोई भी सरकार रोगी को इलाज से मना नहीं कर सकती है। इनता ही नहीं दुर्घटना में घायल व्यक्ति के इलाज में इंकार करना चिकित्सकीय आचार संहिता का उल्लंघन है।

बालाकृष्णन ने यह बात रविवार को मध्यप्रदेश मानवाधिकार आयोग द्वारा आयोजित स्वास्थ्य के अधिकार विषय पर आयोजित कार्यशाला के समापन मौके पर कही।

जस्टिस बालाकृष्णन ने कहा कि मानव अधिकारों की वैश्विक घोषणा में प्रत्येक व्यक्ति और उसके परिवार को अच्छे स्वास्थ्य के लिए भोजन, वस्त्र, दवा, सामाजिक सेवाएं तथा चिकित्सा सेवा देने की बात कही गई है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय ने हमेशा स्वास्थ्य के अधिकार को आवश्यक माना है।

सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के आधार पर उन्होंने कहा कि अब लोगों को आपातकालीन चिकित्सा उपचार का अधिकार मिल गया है, क्योंकि चिकित्सकीय विधिक प्रकरण में कोई अस्पताल या डाक्टर पीड़ित का इलाज करने से इंकार नहीं कर सकता है।

उन्होंने बताया कि पारिश्रमिक लेकर किए गए रोग निदान व उपचार को अब उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में ले लिया गया है। पारिश्रमिक लेकर दी गई चिकित्सा सेवा में लापरवाही तथा कमी की स्थिति में चिकित्सक व संस्थान के विरूद्ध कार्रवाई की जा सकती है। इस विधिक प्रावधान से भी रोगियों के हितों का संरक्षण होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वास्थ्य के अधिकार के वैश्विक स्तर पर सार्थक अधिकार के रूप में स्वीकारना होगा।

इस मौके पर मध्यप्रदेश के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश जस्टिस ए़ क़े पटनायक, मध्यप्रदेश मानव अधिकर आयोग के अध्यक्ष जस्टिस डी़ एम़ धर्माधिकारी, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस पी़ पी़ नावलेकर, सदस्य द्वय जस्टिस नारायण सिंह और विजय शुक्ला मुख्य रूप से उपस्थित थे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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