'मेरी ओर से कोई वकील कोर्ट नहीं आएगा, केजरीवाल के बाद सिसोदिया का भी फैसला, जस्टिस स्वर्ण कांता को लिखा पत्र
Manish Sisodia Justice Swarana Kanta Sharma: अरविंद केजरीवाल के बाद अब आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता मनीष सिसोदिया ने भी दिल्ली एक्साइस पॉलिसी (शराब घोटाला) मामले में बड़ा कदम उठाया है। सिसोदिया ने मंगलवार (28 अप्रैल 2026) को दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा को पत्र लिखकर कहा कि वह उनकी अदालत में न तो खुद पेश होंगे और न ही अपनी ओर से किसी वकील को नियुक्त करेंगे।
सिसोदिया के पत्र में क्या लिखा? न वकील , न पेशी अब सिर्फ सत्याग्रह
अपने पत्र में मनीष सिसोदिया ने कहा कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है और अब उनके पास "सत्याग्रह" के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। उन्होंने यह भी कहा कि वह किसी भी वकील को अपनी ओर से पेश नहीं करेंगे।

साथ ही उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जिक्र करते हुए कहा, "आपके बच्चों का भविष्य तुषार मेहता के हाथों में है।" दरअसल यह पूरा विवाद उस समय और गहरा गया जब 20 अप्रैल को जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने जज से मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग की थी।
अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वह न्यायपालिका का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन गांधीवादी सिद्धांत "सत्याग्रह" का पालन करते हुए उनके लिए इस अदालत में पेश होना मुश्किल है। अब आम आदमी पार्टी के दोनों बड़े नेताओं के इस फैसले को राजनीतिक और कानूनी हलकों में काफी अहम माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह न व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होंगे और न ही किसी वकील के जरिए अपना पक्ष रखेंगे।
क्या था मामला?
दरअसल यह पूरा विवाद उस समय और गहरा गया जब 20 अप्रैल को जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने न्यायाधीश से मामले की सुनवाई से खुद को अलग (रिक्यूज) करने की मांग की थी।
इससे पहले 20 अप्रैल को फैसला सुनाते हुए जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा ने स्पष्ट किया था कि बिना विचार किए सुनवाई से अलग हो जाना आसान विकल्प हो सकता था,लेकिन उन्होंने न्यायपालिका की गरिमा को सबसे ऊपर रखते हुए मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला लेना उचित समझा।
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया, तो कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया था। यह केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं था, बल्कि न्यायिक संस्था की परीक्षा का भी विषय था। दिल्ली हाई कोर्ट ने दोहराया कि जब तक ठोस सबूतों से खंडन न हो जाए न्यायाधीश की निष्पक्षता को मानकर चला जाता है। किसी याचिकाकर्ता की सिर्फ आशंका या व्यक्तिगत धारणा के आधार पर न्यायाधीश को मामले से अलग नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति शर्मा ने यह भी कहा कि किसी को भी ऐसी स्थिति पैदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे न्यायिक प्रक्रिया का स्तर गिरे। उन्होंने कहा, "झूठ, चाहे अदालत में हो या सोशल मीडिया पर, उसे हजार बार दोहराने से वह सच नहीं बन जाता।"
उन्होंने अरविंद केजरीवाल के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि पक्षपात के दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है, जिसमें उनके पारिवारिक सदस्यों की पेशेवर गतिविधियों से जुड़े आरोप भी शामिल हैं।












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