IAS Rinku Singh Rahi ने क्यों लिया इस्तीफा वापस? पिता आटाचक्की चलाते थे-बेटे ने माफिया से गोली खाई, पूरी कहानी

Who Is IAS Rinku Singh Rahi: उत्तर प्रदेश कैडर के 2023 बैच के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने 26 मार्च 2026 को राष्ट्रपति को 'तकनीकी इस्तीफा' भेजकर सनसनी मचा दी थी। 'काम नहीं तो वेतन नहीं' का नैतिक रुख अपनाते हुए उन्होंने पीसीएस में वापसी की मांग की। लेकिन महज एक महीने बाद, 27 अप्रैल को उन्होंने गोपनीय रूप से अपना इस्तीफा वापस ले लिया। अब सवाल यह है कि आखिर क्या हुआ कि यह सख्त कदम उठाने वाले अफसर ने पलट दिया? क्या शासन ने उन्हें भरोसा दिलाया? या फिर सिस्टम की 'साइडलाइनिंग' की कहानी में नया ट्विस्ट आ गया?

यह घटना महज एक अधिकारी का व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश प्रशासन की अंदरूनी खामियों, ईमानदारी की सजा और ब्यूरोक्रेसी में 'सम्मानजनक काम' की मांग का आईना है। आइए पूरी कहानी विस्तार से समझते हैं कि रिंकू सिंह राही की संघर्ष भरी जिंदगी से लेकर इस्तीफा वापसी तक....

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Who Is IAS Rinku Singh Rahi: रिंकू सिंह राही कौन हैं? चक्की वाले का बेटा कैसे बना IAS?

रिंकू सिंह राही (44 वर्ष) अलीगढ़/हाथरस के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता शिवदान सिंह आटा चक्की चलाकर परिवार का गुजारा करते थे। घर में न कोई सरकारी नौकरी का रसूख था, न पैसे की भरमार। लेकिन रिंकू में जुनून था, एक ईमानदारी और जनसेवा का।

माफिया की गोली भी नहीं डरा सकी!

2008 में वे प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) में समाज कल्याण अधिकारी बने और मुजफ्फरनगर पोस्टिंग मिली। यहां उन्होंने विभाग में चल रहे भारी भ्रष्टाचार, छात्रवृत्ति घोटाले (लगभग 100 करोड़ रुपये) को उजागर किया। नतीजा ये रहा कि 26 मार्च 2009 को माफिया ने उन पर 7 गोलियां चला दीं। चेहरा बिगड़ गया, एक आंख की रोशनी चली गई। लंबा इलाज चला, कई सर्जरी हुईं। लेकिन रिंकू हारे नहीं। बिस्तर पर लेटे-लेटे यूपीएससी की तैयारी की। 16 प्रयासों के बाद 2021 में 683 रैंक हासिल कर आईएएस बने (2023 बैच, यूपी कैडर)। यह कहानी फिल्मी लगती है, लेकिन हकीकत है। विकलांगता कोटा का फायदा उठाकर उन्होंने देश सेवा का सपना पूरा किया। लेकिन सिस्टम ने उन्हें 'ईमानदार' होने की सजा दी।

वकीलों के सामने 'उठक-बैठक' वाली घटना: वायरल वीडियो ने बदल दी पोस्टिंग

जुलाई 2025 में रिंकू सिंह राही शाहजहांपुर के पुवाया (पुवायां) तहसील में एसडीएम बने। पहले दिन ही निरीक्षण के दौरान उन्होंने तहसील परिसर में एक मुंशी को शौचालय के बाहर गंदगी फैलाते देखा। नाराज होकर उन्होंने मुंशी से 'उठक-बैठक' करवाई। वकीलों ने विरोध किया। स्थिति बिगड़ते देख रिंकू ने खुद कान पकड़कर सार्वजनिक रूप से उठक-बैठक की और कहा कि नियम सबके लिए बराबर हैं। सफाई की जिम्मेदारी हमारी भी है। वीडियो वायरल हो गया। 24-36 घंटे के अंदर उन्हें शाहजहांपुर से हटा दिया गया और लखनऊ के राजस्व परिषद (Revenue Council) में 'अटैच' कर दिया गया। यह 'सजा' थी या 'सुरक्षा'? रिंकू को 9 महीने तक कोई फील्ड पोस्टिंग नहीं मिली। सिर्फ वेतन आता रहा, काम नहीं। वे कहते हैं कि तनख्वाह तो मिल रही है, लेकिन जनसेवा का मौका नहीं।

IAS Rinku Singh Rahi Resign Decision: इस्तीफे का फैसला- 'समांतर व्यवस्था' पर सवाल, PCS में वापसी की मांग

26 मार्च 2026 को रिंकू ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और यूपी नियुक्ति विभाग को 7 पेज का पत्र लिखा। इसमें साफ कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के समांतर एक अलग सिस्टम चल रहा है। मुझे काम करने का अवसर नहीं दिया जा रहा। बिना काम के वेतन लेना नैतिक रूप से गलत है। उन्होंने अपनी पुरानी पीसीएस सेवा (समाज कल्याण अधिकारी) में वापसी की अपील की। इस्तीफा सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। रिंकू ने मीडिया से कहा कि मुझे पोस्टिंग का लालच नहीं। बस काम करना चाहता हूं। जहां सरकार चाहे, वहां काम करूंगा। उन्होंने आईएएस एसोसिएशन पर भी तंज कसा कि यह सबसे ज्यादा धोखेबाज संस्था है। मेरे साथ महाभारत के कर्ण जैसा हुआ, कुंडल छीन लिए गए।

इस्तीफा वापसी: शासन का भरोसा और उच्चस्तरीय हस्तक्षेप

इस्तीफे के बाद शासन हरकत में आया। सूत्रों के मुताबिक, रिंकू के शैक्षणिक दस्तावेज, जाति प्रमाणपत्र और पुरानी सेवा रिकॉर्ड की जांच हुई। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं मिली। राजस्व परिषद के अध्यक्ष अनिल कुमार समेत वरिष्ठ अधिकारियों ने उनसे मुलाकात की। साथी आईएएस अधिकारियों ने समझाया। मुख्य बात ये है कि भविष्य में सम्मानजनक पोस्टिंग और 'ऐसा दोबारा नहीं होगा' का लिखित/मौखिक आश्वासन मिला। रिंकू ने इस्तीफा वापस ले लिया। प्रक्रिया बेहद गोपनीय रही। न तो रिंकू कोई बयान दे रहे हैं, न शासन। लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि जल्द उन्हें फील्ड पोस्टिंग मिल सकती है। रिंकू का आखिरी बयान कि मुझे शासन के अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है। अब मैं काम पर फोकस करूंगा।

क्या कहता है यह मामला? ब्यूरोक्रेसी की सच्चाई और सबक

रिंकू सिंह राही का पूरा सफर ईमानदारी की कीमत दिखाता है। 2009 में घोटाला उजागर करने पर गोलियां खाईं। आईएएस बनकर फिर 'साइडलाइन' कर दिए गए। उठक-बैठक वाली घटना में उन्होंने सिस्टम सुधारने की कोशिश की, लेकिन सिस्टम ने उन्हें सजा दी। यह घटना यूपी प्रशासन में 'ईमानदार बनाम सुविधाजनक' की लड़ाई उजागर करती है। योगी आदित्यनाथ सरकार 'डबल इंजन' और सुशासन का दावा करती है, लेकिन ऐसे मामले सवाल खड़े करते हैं कि क्या ईमानदार अफसरों को काम नहीं दिया जाता? क्या 'सम्मान' सिर्फ कागजों तक सीमित है? आईएएस एसोसिएशन की आलोचना भी गंभीर है। कई अधिकारी चुपचाप सहते हैं, लेकिन रिंकू ने आवाज उठाई। उनका केस युवा सिविल सर्वेंट्स के लिए मिसाल बन गया है कि काम मांगो, तो सिस्टम जवाब दे।

आगे क्या? नई पोस्टिंग और सिस्टम सुधार की उम्मीद

अब सबकी नजर रिंकू की अगली पोस्टिंग पर है। अगर उन्हें सम्मानजनक जिम्मेदारी मिली, तो यह सिस्टम की जीत होगी। अगर फिर साइडलाइन किए गए, तो सवाल और तेज होंगे। रिंकू सिंह राही की कहानी साबित करती है कि साधारण परिवार से आईएस बनना आसान नहीं, लेकिन ईमानदारी से टिके रहना और भी मुश्किल। पिता शिवदान सिंह ने कहा था कि मेरा बेटा देशभक्त है। सिस्टम ने उसे मजबूर किया। अब देखना होगा कि सिस्टम अपना वादा निभाता है या नहीं।

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