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12 साल से मां को कंधे पर तीर्थ यात्राएं करा रहा है कलयुग का श्रवण

By Staff
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रांची, 4 अगस्त (आईएएनएस)। अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार की कहानियां अब दुर्लभ नहीं रह गई हैं लेकिन कैलाश गिरी ब्रह्मचारी की कहानी इन सबसे अलग है। रामायण के चरित्र श्रवण कुमार की तरह वे अपनी अंधी माता को पिछले 12 साल से कंधे पर लेकर तीर्थ स्थानों के भ्रमण पर निकले हैं।

रांची, 4 अगस्त (आईएएनएस)। अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार की कहानियां अब दुर्लभ नहीं रह गई हैं लेकिन कैलाश गिरी ब्रह्मचारी की कहानी इन सबसे अलग है। रामायण के चरित्र श्रवण कुमार की तरह वे अपनी अंधी माता को पिछले 12 साल से कंधे पर लेकर तीर्थ स्थानों के भ्रमण पर निकले हैं।

मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के वर्गी गांव के निवासी 36 वर्षीय कैलाश की शारीरिक सहनशीलता और मानसिक उत्साह की गाथा 1996 में शुरू हुई। अब तक करीब 3000 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके कैलाश इस समय झारखंड में हैं।

थकान के कारण कैलाश इस समय रांची के एक अस्पताल में भर्ती हैं लेकिन इससे वे विचलित नहीं हैं। शीघ्र ही वे नेपाल में जनकपुर, बद्रीनाथ और वृदांवन की यात्रा पर निकलने वाले हैं।

रामायण का पात्र श्रवण कुमार जिस प्रकार एक बहंगी बनाकर उसके दोनों ओर अपने बूढ़े माता-पिता को बैठाकर तीर्थयात्रा पर निकला था। ठीक उसी तरह कैलाश ने भी एक बहंगी बनाई। एक तरफ वह अपनी माता को बैठाता है और दूसरी ओर आवश्यकता की अन्य वस्तुएं रखता है।

सबसे बड़ी बात है कि श्रवण के माता-पिता की तरह उसकी मां भी अंधी हैं। अपनी इस अतुलनीय यात्रा में कैलाश घर नहीं लौटा है।

कैलाश अब तक अपनी माता को चित्रकूट, तिरुपति, इलाहाबाद, अमरकंटक, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी, गंगासागर, कालीघाट और अन्य तीर्थस्थलों का भ्रमण करा चुका है।

कैलाश की यात्रा काफी कठिन है और वह रोजाना 15 से 20 किलोमीटर की दूरी तय करता है। निर्धन मां-बेटे पूरी तरह दान पर निर्भर हैं और शाम को जहां आसरा मिलता है वहीं विश्राम कर लेते हैं।

कैलाश की मां ने बताया कि उसने कई बार बेटे से यात्रा रोक देने के लिए कहा लेकिन कैलाश ने निर्णय कर लिया है कि वह तीर्थयात्रा अवश्य पूरी करेगा।

अपने भविष्य और यात्रा के बारे में पूछने पर कैलाश ने कहा, "भविष्य के बारे में मैं कुछ नहीं जानता है और जब तक प्रभु की इच्छा होगी मेरी यात्रा जारी रहेगी। मेरे लिए मेरी मां की इच्छा किसी भी अन्य वस्तु से अधिक महत्वपूर्ण है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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