आसान नहीं होगा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से प्रतिबंध हटवाना
विएना, 4 अगस्त (आईएएनएस)। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए)में निगरानी समझौते को मंजूरी मिल जाने के बाद भले ही भारत ने राहत की सांस ली हो, लेकिन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी)से प्रतिबंध हटवा पाना इतना आसान नहीं होगा।
विएना, 4 अगस्त (आईएएनएस)। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए)में निगरानी समझौते को मंजूरी मिल जाने के बाद भले ही भारत ने राहत की सांस ली हो, लेकिन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी)से प्रतिबंध हटवा पाना इतना आसान नहीं होगा।
आईएईए मामलों से जुड़े आस्ट्रिया के एक विशेषज्ञ ने आईएएनएस को नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, "परमाणु अप्रसार, ईरान के प्रति अमेरिकी-इजरायल नीति तथा परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले दो अन्य देशों इजरायल और पाकिस्तान पर इस सौदे के संभावित प्रभावों को लेकर मुझे इस पर ऐतराज है।"
45 सदस्यों वाले संगठन एनएसजी का विश्व के परमाणु कारोबार पर नियंत्रण है और भारत द्वारा एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं करने वह उसे परमाणु प्रौद्योगिकी बेचे जाने के खिलाफ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था आईएईए से हरी झंडी मिलने के बाद भारत को अब एनएसजी में कामयाबी पाने के बाद अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी हासिल करनी होगी।
आस्ट्रिया आईएईए और एनएसजी दोनों के ही संचालक मंडलों का ही सदस्य है। आस्ट्रिया के विदेश मंत्रालय के अधिकारी पहले ही कह चुके हैं कि आईएईए में सर्वसम्मति से मंजूरी मिलने का मतलब यह हरगिज नहीं है कि एनएसजी में भी ऐसा ही होगा।
बहुत से अन्य देशों के राजनयिकों ने भी कुछ ऐसी ही राय जाहिर की है, हालांकि मामले की नजाकत को भांपते हुए वे इस बारे में खुलकर कुछ नहीं कहना चाहते।
एनएसजी में भारत के मसले को लेकर जल्दी ही बैठक होने वाली है। आस्ट्रियाई विशेषज्ञ ने हैरानी जताते हुए कहा, "यदि पाकिस्तान के साथ भारत जैसा ही व्यवहार हो, तो एनपीटी का मतलब क्या रह जाता है।
मेरे विचार से यह समझौता (भारत-अमरीकी परमाणु करार)पूरी तरह पाखंड है कि यह गरीब के विकास एवं ऊर्जा जरूरतों के लिए किया जा रहा है। मेरा सबसे नकारात्मक आकलन यही है कि यह करार गुटनिरपेक्ष आंदोलन के ताबूत की आखिरी कील तथा एनपीटी के लिए सजा ए मौत होगा। परमाणु निरस्त्रीकरण पर हमारा रुख क्या है।"
भारत आईएईए का सदस्य है, लेकिन एनएसजी का नहीं, जिसने परमाणु प्रसार रोकने के लिए कड़े कानून बनाए हैं।
उन्होंने संकेत दिया कि वैसे अमेरिका ने भी वर्ष 2005 से पहले अमेरिका भी भारत के साथ परमाणु कारोबार के खिलाफ था। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा जुलाई 2005 को करार की घोषणा किए जाने के बाद से अमेरिका एनएसजी में भारत के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी और ईंधन का बाजार खोलने के लिए पर जोर देता रहा है।
अमेरिका इन दिनों भारत के साथ अपने करार के बारे में अन्य पश्चिमी देशों को राजी करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हुए इस करार को ऐतिहासिक करार दे रहा है।
उधर आईएईए में मंजूरी मिलने के बाद अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत तीन दशक के बाद परमाणु अप्रसार की मुख्यधारा में प्रवेश पा गया है। आईएईए के साथ निगरानी समझौते से वह अब परमाणु अप्रसार जगत से बाहर नहीं रह गया है।
अमेरिकी अधिकारी इन दिनों एनएसजी के आस्ट्रिया, आयलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे देशों को भारत "जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र" को रियायत देने के लिए राजी करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।
करार के बारे में आशावादी रुख रखने वालों का मानना है कि यदि अमेरिका को एनएसजी और अमेरिकी कांग्रेस में मंजूरी मिलने की उम्मीद नहीं होती, अमेरिकी प्रशासन यह मामला संभवत: आईएईए में नहीं ले जाता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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