स्वयं सहायता समूहों ने बदली असम की ग्रामीण अर्थव्यवस्था
नागांव (असम), 1 जून (आईएएनएस)। एक समय में करुणा कालिता आतंकवादी समूह 'युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम' (उल्फा) में विस्फोटक विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय था। जंगल में जिंदगी बिताते हुए वह ऊब चुका था इसलिए 2003 में उसने आत्समर्पण कर दिया। अब वह स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बनाकर नई जिंदगी जी रहा है।
नागांव (असम), 1 जून (आईएएनएस)। एक समय में करुणा कालिता आतंकवादी समूह 'युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम' (उल्फा) में विस्फोटक विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय था। जंगल में जिंदगी बिताते हुए वह ऊब चुका था इसलिए 2003 में उसने आत्समर्पण कर दिया। अब वह स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बनाकर नई जिंदगी जी रहा है।
दो बच्चों का 36 वर्षीय पिता कालिता अपने गांव धिंग में इन दिनों आधुनिक सुविधाओं से संपन्न खेती के जरिए गोभी, सरसों और पृथ्वी की सबसे तीखी मिर्च भुट जोलोकिया की खेती करने में जुटा है।
करुणा कहता है, "मेरे एसएचजी में 12 अन्य सदस्य हैं। पिछले साल ट्रैक्टर खरीदने से पहले ही कठिन परिश्रम की बदौलत हमने दस लाख रुपये कमा लिए थे।"
पूर्व अलगाववादियों से लेकर घरेलू बीवियों तक सभी को शिक्षित करने के बाद राज्य में बेरोजगारी बढ़ गई थी। इसलिए असम के उत्तरपूर्वी क्षेत्रों के हजारों लोगों ने इस तरह से लाभ कमाने की योजना बनाई।
यहां पिछड़े इलाकों में 90 हजार से ज्यादा एसएचजी काम कर रहे हैं। एक अन्य युवक नंदेश्वर दिहिंगिया का कहना है, "पहले हमें 3,000 रुपये प्रतिमाह कमाना भी मुश्किल लगता था, लेकिन आज हम कमाई के साथ एक-दूसरे की मदद भी कर रहे हैं।"
केंद्र सरकार द्वारा 'स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना' (एसजीएसवाई) कई परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर लाने के लिए यह योजना शुरू की गई थी।
मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने इस योजना की बदौलत असम के पिछड़े इलाकों के हालात बेहतर होने की उम्मीद जताई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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