एक लड़की को देखा तो ऐसा हुआ...अनपढ़ दर्जी बन गया राष्ट्रपति
नई दिल्ली। 2020 नयी उम्मीदों के साथ शुरू हुआ है। संकल्प और साहस हो तो हम अपनी उम्मीदों को पूरा कर सकते हैं। इंसान केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं। उसके अंदर असीम ताकत छिपी है। जो उस ताकत को पहचान लेता है वह असंभव को संभव बना देता है। आदमी अगर ठान ले तो कुछ भी कर सकता है। एक पंद्रह-सोलह साल का अनपढ़ लड़का रोटी के लिए कपड़े सिलता था। उसका पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता न था। जिंदगी यूं ही बेतरतीब गुजर रही थी। अचानक उसकी जिंदगी में एक लड़की आयी। वह उसे स्कूल की किताबें पढ़-पढ़ कर सुनाती। वह कपड़े सिलता और किताब की बातें भी सुनता। फिर तो करिश्मा हो गया। बिना स्कूल-कॉलेज गये ही वह लड़का अपने शहर का मशहूर वक्ता बन गया। मानव अधिकार और संविधान पर इतना ओजस्वी भाषण देता कि लोग दंग रह जाते। वह आगे बढ़ता गया। एक दिन ऐसा भी आया कि वह राष्ट्रपति बन गया। ये कहानी आज के दौर की नहीं है लेकिन कभी पुरानी नहीं हो सकती। इसमें वो ताकत है जो मुर्दे में भी जान फूंक दे। तो ये कहानी पढ़िए और नये साल में नये इरादों को बुलंद बनाइए।

गुदड़ी के लाल
ये कहानी है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति एंड्र्यू जॉनसन की। वे अमेरिका के 17वें राष्ट्रपति थे। उन्होंने अनहोनी को होनी कर दिखाया था। जॉनसन का जन्म अमेरिका के रेलिघ में 29 दिसम्बर 1808 को हुआ था। उनके माता-पिता बहुत ही गरीब थे। अनपढ़ थे। जॉनसन जब तीन साल के थे तो उनके पिता जैकब का निधन हो गया था। घर चलाने के लिए उनकी मां पौली कपड़े धोने का काम करने लगीं। गरीबी के कारण जॉनसन ने स्कूल का मुंह नहीं देखा। इस बीच उनकी मां ने टर्नर डॉर्टी से दूसरा विवाह कर लिया। टर्नर भी बेहद गरीब था। जॉनसन घरेलू हालात से नाखुश थे। वे जब दस साल के थे तब उनकी मां ने उन्हें एक दर्जी की दुकान पर सिलाई सिखाने के लिए भेज दिया। कुछ समय बाद उनका छोटा भाई भी वहां पहुंच गया। इस दर्जी के यहां के यहां जॉनसन ने करीब पांच साल तक काम किया। फिर एक दिन वे अपने छोटे भाई के साथ वहां से भाग गये। वे रेलिघ से कार्थेज शहर (नॉर्थ केरोलिना) पहुंचे। कार्थेज में जॉनसन ने सिलाई की दुकान खोल ली और टेलर मास्टर बन गये। उस समय उनकी उम्र पंद्रह -सोलह साल थी। उनकी उम्र दुकान खोलने की नहीं थी। जॉनसन इस बात से डरे रहते थे कि कहीं पुलिस गिरफ्तार न कर ले। वे कई शहरों में गये लेकिन कहीं रम नहीं सके। वे कभी मां के पास लौटते फिर किसी दूसरे शहर चले जाते। बात जम नहीं रही थी।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...
आखिर में टीन एजर एंड्र्यू जॉनसन ने नॉर्थ कैरोलिना राज्य छोड़ कर टेनेसी प्रांत के ग्रीनवेली को अपना ठिकाना बनाया। यहां उनकी सिलाई की दुकान ठीक-ठाक चलने लगी। ये 1827 की बात है। तब उनकी उम्र 18 साल थी। एक दिन जॉनसन ग्रीनवेली के एक मशहूर स्कूल के पास से गुजर रहे थे। उसी समय स्कूल में बच्चों की छुट्टी हुई थी। लड़के लड़कियों का झुंड एक एक कर स्कूल से बाहर निकल रहा था। इस दरम्यान जॉनसन की नजर सड़क पर जा रही एक लड़की पर ठहर गयी। वह लड़की बेफिक्र हो कर अपनी सहलियों के साथ बातें करती हुई जा रही थी। अचानक उस लड़की की नजर जॉनसन से मिली। वह सोचने लगी कि एक साधारण सा परेशानहाल लड़का भला उसे क्यों देख रहा है ? लड़की से नजरें मिलते ही जॉनसन डर गये। कहां एक अनपढ़, गरीब दर्जी और कहां एक स्कूल की पढ़ी लिखी लड़की। भला कोई मेल है। लड़की ने दुत्कार दिया तो..। घबरा कर जॉनसन ने रास्ता बदल लिया। उनके मन में हीन भावना तो थी लेकिन वह लड़की उन्हें अच्छी लगी थी। स्कूल की छुट्टी के समय वे अक्सर उस रास्ते से गुजरते। लड़की को भी जॉनसन की सादगी और मासूमियत भाने लगी। इस लड़की का नाम एलिजा मैक्कार्डल था। मुलाकातें होती रहीं। फिर दोनों दोस्त बन गये।

तुम क्या मिले, खुदा मिल गया...
1827 में जब जॉनसन और एलिजा की मुलाकात हुई तब ये कोई नहीं जान रहा था अमेरिका के नये इतिहास की नींव पड़ रही है। अनपढ़ जॉनसन को पढ़ी लिखी एलिजा ने तमाम कमियों के साथ स्वीकार किया। एलिजा ने जॉनसन को बताया कि वह अच्छे स्कूल में पढ़ती जरूर है लेकिन उसके पिता मोची हैं और जूते बनाते हैं। तब जॉनसन को लगा कि एक गरीब और साधारण आदमी भी कुछ बड़ा कर सकता है। 1827 में ही जॉनसन ने एलिजा से शादी कर ली। उस समय जॉनसन की उम्र 18 साल और एलिजा की उम्र 16 साल थी। घर चलाने के लिए जॉनसन ने दर्जी का काम जारी रखा। एलिजा ने अपने पति को पढ़ाने बीड़ा उठा लिया। लेकिन जॉनसन अपना काम छोड़ना नहीं चाहते थे। तब फैसला हुआ जॉनसन कपड़ा सीते रहेंगे और एलिजा किताबों का पाठ उन्हें पढ़ कर सुनाती रहेगी। ये सिलसिला चल पड़ा। जॉनसन की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। जोश और उत्साह ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बना दिया। पत्नी की जी तोड़ मेहनत से वे सुन-सुन कर ही पढ़ने लगे। वैसे जैसे प्रचीन भारत में गुरुकुल आश्रम में शिष्य सुन-सुन ही वेद पुराण कंठस्थ कर लेते थे। कुछ ही साल में जॉनसन का कायापलट हो गया। बिना स्कूल-कॉलेज गये ही उनको मानव अधिकार, संविधान और गणित का अच्छा ज्ञान हो गया। जॉनसन बहुत अच्छा भाषण भी करने लगे। जल्द ही ग्रीनविले शहर में उनके भाषणों की चर्चा होने लगी।

एक अनपढ़ दर्जी बन गया राष्ट्रपति
1829 में जब ज़ॉनसन सिर्फ 21 साल के थे तब ग्रीनविले म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के नगर प्रशासक (एल्डरमैन) चुने गये। इसके बाद उनकी गिनती अमेरिकी के एक ओजस्वी वक्ता के रूप में होने लगी। चूंकि उस समय संचार माध्यामों का आज की तरह विकास नहीं हुआ था इसलिए नेताओं की हैसियत उनके भाषणों से आंकी जाती थी। शैक्षणिक योग्यता का बाद में स्थान आता था। जॉनसन की खूबियों को देख कर डेमोकेर्टिक पार्टी ने उन्हें जोड़ लिया। 1841 में वे टेनेसी राज्य सिनेट के सदस्य चुने गये। उस समय तक उन्होंने दर्जी का काम छोड़ा नहीं था। वे कपड़ा सीते और राजनीति भी करते। टेलरिंग से उन्होंने बंगला, गाड़ी सब कुछ हासिल किया। फिर वे अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के लिए चुने गये। फिर तो राजनीति में कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते ही चले गये। 1853 में टेनेसी के गवर्नर चुने गये। 1865 में जब अब्राहम लिंकन को अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया था उस समय एंड्र्यू जॉनसन उपराष्ट्पति के रूप में निर्वाचित हुए थे। यह लिंकन का दूसरा कार्यकाल था। अप्रैल 1965 में जब राष्ट्पति लिंकन थियेटर में नाटक देख रहे थे तब उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। उपराष्ट्रपित बने हुए जॉनसन को सिर्फ 42 दिन ही हुए थे कि उन्हें अचानक राष्ट्रपति का पदभार संभालना पड़ा। इस तरह एक पढ़ी लिखी लड़की ने एक अनपढ़ (स्वाध्याय से ज्ञानी) दर्जी को अमेरिका के सर्वोच्च पद पर पहुंचा दिया था।
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