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नेपालः राजनीतिक संकट और नई सरकार

Madhav Kumar Nepal
नेपाल में माओवादी नेता प्रचंड के इस्तीफे के बाद शुरू हुआ राजनैतिक संकट माधव कुमार नेपाल को एकमत से नेपाल का नया प्रधानमंत्री चुनने के साथ ही समाप्त होता दिख रहा है । नेपाली कांग्रेस और मधेशियों के समर्थन के बाद चार मई से जारी राजनीतिक संकट समाप्त हो गया। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष गिरिजा प्रसाद कोईराला ने प्रधानमंत्री पद के लिए 56 साल के माधव कुमार नेपाल के नाम का प्रस्ताव रखा। सीपीएन-यूएमएल चेयरमैन झलनाथ खनाल सहित 22 दलों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। 601 सदस्यों वाली संसद में माधव नेपाल को 22 पार्टियों के 355 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है।

किंगमेकर कोइराला

गौरतलब है कि माओवादियों ने दो हफ्ते से अधिक समय तक चले संसद में अपने गतिरोध को 22 मई को खत्म कर दिया। इसी के साथ नेपाल में राजनीतिक संकट से राहत पाने और नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया था। नेपाल की 601 सदस्यों वाली संविधान सभा में माधव नेपाल को 355 सदस्यों ने समर्थन का ऐलान किया। नेपाल में सत्ता माओवादियों के हाथ से निकल भले कम्युनिस्टों के हाथ में चली गई हो, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर नेपाली कांग्रेस के प्रमुख गिरिजा प्रसाद कोइराला को बतौर किंग मेकर स्थापित कर दिया है।

विश्लेषकों का मानना है कि कोइराला ने काफी बुद्धिमानी से सीपीएन-यूएमएल का इस्तेमाल कर माओवादी नेता पुष्प कुमार दहल 'प्रचंड' को सत्ता से बाहर कर दिया। 2006 में माओवादियों को मुख्य धारा में लाने वाले गिरिजा प्रसाद कोइराला ही थे, लेकिन कोइराला और प्रचंड के बीच अविश्वास की दरार राष्ट्रपति चुनाव के दौरान पड़ गई थी। दरअसल पहले प्रचंड ने कहा था कि वे कोइराला द्वारा नामित राष्ट्रपति का समर्थन करेंगे, लेकिन बाद में वे अपनी बात से मुकर गए। अंतत: कोइराला के समर्थन से राम बरन यादव ही राष्ट्रपति बने, लेकिन इस घटना ने दोनों नेताओं के बीच दूरी बढ़ा दी।

कभी भी गिर सकती थी सरकार

कुछ माह पहले कोइराला ने एक बयान में कहा था कि मुझे प्रचंड सरकार को गिराने की जरूरत नहीं है। माओवादियों की सरकार पके आम की तरह है, खुद ही कभी भी गिर सकती है। आखिरकार उनकी बात सच भी हो गई। सेनाध्यक्ष रुकुमंगद कतवाल की बर्खास्तगी पर राष्ट्रपति के साथ हुए विवाद के बाद प्रचंड ने इस्तीफा दे दिया। माओवादियों के सत्ता से बाहर होने के बाद कोइराला दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता होने के नाते स्वयं भी प्रधानमंत्री पद के लिए दावा ठोक सकते थे। लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक माधव कुमार नेपाल का नाम प्रस्तावित कर उन्होंने माओवादियों को सबक सिखाया है। माओवादियों के बजाय नरमपंथी कम्युनिस्टों के हाथ में सत्ता जरूर गई है, लेकिन ये सत्ता नेपाली कांग्रेस के 113 सांसदों की बदौलत ही बनी रह सकती है।

पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे कोइराला ने खुद संसद में उपस्थित रह कर माधव कुमार नेपाल का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया था। ऐसा कर उन्होंने माओवादियों को उसके सहयोगियों से अलग कर दिया। दूसरी ओर माओवादियों ने कहा है कि वे इस चुनाव का विरोध करेंगे। सेना प्रमुख रकमांगद कटवाल को हटाने के विवाद के कारण गठबंधन के दलों ने माओवादीनीत सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, जिसके कारण नौ माह पुरानी उनकी सरकार गिर गई थी। पिछले साल हुए संविधान सभा के चुनाव में हार की वजह से सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए मृदुभाषी कम्युनिस्ट नेता माधव कुमार नेपाल ने देश के शीर्ष पद पर पहुँचकर अपने राजनीतिक कौशल को साबित कर दिया।

पड़ोसी देशों से संबंध

नेपाल ने ताकतवर माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड का स्थान लिया, जिन्होंने सेना प्रमुख जनरल रुकमांगद कटवाल की बर्खास्तगी के मामले में राष्ट्रपति रामबरन यादव से तल्खी की वजह से इस महीने के शुरू में इस्तीफा दे दिया था। प्रचंड के त्याग-पत्र से देश संवैधानिक तथा राजनीतिक संकट से घिर गया था
प्रचंड के इस्तीफे के बाद नेपाल में नये प्रधानमंत्री के चुनाव के रास्ते से माओवादियों के हटने के बीच कार्यवाहक प्रधानमंत्री और माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने आरोप लगाया कि भारत और चीन के साथ अपने देश के सम्बन्धों को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश उनकी सरकार के पतन की वजह बन गई।

प्रचंड ने सांसदों से कहा कि नए परिप्रेक्ष्य में नेपाल के पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को फिर से निर्धारित करने की कोशिश के बाद ऐसी स्थिति बन गई कि उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना ही पड़ा। सेना प्रमुख रुकमांगद कटवाल को बर्खास्त करने के कैबिनेट के फैसले को राष्ट्रपति रामबरन यादव द्वारा अमान्य करार देकर कटवाल को बहाल करने के कदम के विरोध में प्रचंड ने इस महीने के शुरू में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। प्रचंड ने कहा कि उनकी पार्टी भारत और चीन के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाए रखना चाहती है। उन्होंने कहा मैं महसूस करता हूं कि नेपाल के अपने दो पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को पुनर्परिभाषित करने का जरूरी काम अभी तक पूरा नहीं किया गया है। बड़े भाई और छोटे भाई की रवायत अब भी जारी है। कार्यवाहक प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पिछले साल सत्ता सम्भालने के कुछ दिन बाद ओलम्पिक खेलों के दौरान चीन जाकर उन्होंने रवायतें बदलने की कोशिश की थी।

भारत की चिंताएं

इसके बाद से नेपाल में माओवादियों के आक्रामक रवैये को देखते हुए भारत की चिंताएं बढ़ने लगी। नेपाल में राजनीति गतिरोध के बाद भारत-नेपाल के बीच 117 किलोमीटर की सीमा पर है अलर्ट कर दिया गया है एसएसबी मुख्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक, चौकसी बढ़ाने और घुसपैठ की किसी भी कोशिश को नाकाम करने के निर्देश जारी किए गए हैं। नेपाल में बिगड़े राजनीतिक हालात का फायदा उठाकर अवांछित तत्व सीमा पर गतिविधि न बढ़ाएं, इस पर खासतौर पर नजर रखने को कहा गया है। एसएसबी चीफ एमवी कृष्णा राव ने नई दिल्ली में सीनियर अफसरों की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाकर हालात का जायजा लिया। उन्होंने बताया कि देश में लोकसभा चुनावों के चलते हम नेपाल सीमा पर पहले से ही निगरानी बढ़ा चुके हैं। आज हमने ताजा हालात का जायजा लिया है। नेपाल से लगे राज्यों - उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम को भी हाई अलर्ट कर दिया गया है।

माधव कुमार नेपाल

करीब 200 साल पहले माधव के परिजन भारत के बिहार से अपना सरमाया समेटकर नेपाल में बस गए थे। वर्ष 1993 से 2008 तक सीपीएन यूएमएल के महासचिव रहे माधव ने इस दौरान राजनीति तथा प्रशासनिक विवेक अर्जित किया। वर्ष 1969 से कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल माधव भारत के प्रख्यात विद्वान राहुल सांकृत्यायन तथा रूस के क्रांतिकारी लेखक मैक्सिम गोर्की से प्रभावित बताए जाते हैं। माधव वर्ष 1994 में सीपीएन-यूएमएल की अगुवाई में बनी अल्पमत सरकार में उपप्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। वे राष्ट्रीय असेम्बली में विपक्ष के नेता की भूमिका भी निभा चुके हैं।

नेपाल में नया प्रधानमंत्री तो बन गया पर माओवादियो के समर्थन के बिना नेपाल के नए संविधान की रचना की प्रक्रिया अब कितनी सामान्य हो पायेगी ये चिंता का नया विषय है। गौरतलब है की नेपाल में राजशाही के खिलाफ हुई क्रांति के बाद नए संविधान को बनाने के लिए आम चुनाव हुए थे जिसमें माओवादियों को सफलता तो मिली पर वे पूर्ण बहुमत नहीं पा सके फलस्वरूप मिलीजुली सर्कार का गठन हुआ पर मावोवादी नेता प्रचंड को लोकतान्त्रिक मोर्चो पर लगातार हार का सामना करना पड़ा था। पहले रास्त्रपति के चुन्वो में वे मनमाफिक नतीजे नहीं ला सके और फिर संसद के अध्यक्छ पद पर उन्हें हर का सामना करना पड़ा। गुरिल्ला कार्यवाही को सफलता तक पहुचने वाले प्रचंड को लोकतंत्र नहीं रास आ रहा है। फैसलों की जल्दीबाजी और कोइराला की कूटनीति नें उन्हें विपक्ष में बैठने पर मजबूर कर दिया है. राजशाही से मुक्ति के बाद नेपाल लोकतंत्र की राह पर तो चल पड़ा है लेकिन नेपाल में इसकी राह आसन नहीं दिख रही है।

[उत्कर्ष सिन्हा सोशल एक्टीविस्ट हैं और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर लिखते हैं।]

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