Bashir Badr Last Post: बशीर बद्र का निधन! आखिरी पोस्ट में छोड़ गए मोहब्बत का सबसे दर्दनाक पैगाम!

Bashir Badr Last Post: उर्दू अदब की दुनिया से एक बेहद दुखद खबर सामने आ रही है। अपनी रूहानी और रूमानी शायरी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र (Dr. Bashir Badr) अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह पिछले काफी समय से लंबी बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

इसी बीच सोशल मीडिया पर उनके ऑफिशियल एक्स (ट्विटर) हैंडल से किया गया एक आखिरी पोस्ट (Bashir Badr Last Post) तेजी से वायरल हो रहा है। इस पोस्ट को देखकर उनके फैंस की आंखें नम हो गई हैं। आइए जानते हैं बशीर बद्र ने अपनी आखिरी पोस्ट में दुनिया के नाम क्या पैगाम छोड़ा है?

Bashir Badr

आखिरी पोस्ट में बशीर बद्र ने लिखे थे ये भावुक शब्द

डॉ. बशीर बद्र के ऑफिशियल एक्स (ट्विटर) अकाउंट (@BashirBadra) पर नजर डालें तो 15 जुलाई 2025 को की गई पोस्ट ही उनकी आखिरी पोस्ट है। हालांकि, इस अकाउंट की वनइंडिया हिंदी पुष्टि नहीं करता है। इस पोस्ट में उन्होंने अपनी मशहूर ग़ज़ल के दो बेहद खूबसूरत शेर साझा किए थे, जो आज उनके जाने के बाद फैंस के दिलों को चीर रहे हैं।

उन्होंने लिखा था:

होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते
साहिल पे समंदर के ख़ज़ाने नहीं आते
पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी
आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते

निधन के बाद फैंस उनके इसी ट्वीट को री-ट्वीट कर उन्हें नम आंखों से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि उनके जाने से सचमुच उर्दू शायरी का एक बड़ा खजाना हमेशा के लिए छिन गया है।

कानपुर में जन्म, अयोध्या से था पैतृक नाता

15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में जन्मे डॉ. बशीर बद्र का वास्तविक नाम 'सैयद मोहम्मद बशीर' था। हालांकि, उनका पैतृक स्थान फैजाबाद (अयोध्या) जिले का मौज़ा बकिया था। उनके पिता सैयद मोहम्मद नज़ीर पुलिस विभाग में कार्यरत थे। बशीर बद्र की शुरुआती शिक्षा कानपुर और इटावा में हुई, जिसके बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से उच्च शिक्षा और पीएचडी की डिग्री हासिल की। बाद में उन्होंने एएमयू में उर्दू के शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं भी दीं।

जब शिमला समझौते में गूंजे बशीर बद्र के शेर

बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल में ठेठ बोलचाल की आसान भाषा और नए शब्दों का प्रयोग किया। यही वजह थी कि उनकी शायरी हर वर्ग के लोगों के दिलों में आसानी से उतर जाती थी। देश के विभाजन के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे मार्मिक शेर लिखे जो इतने प्रसिद्ध हुए कि शिमला समझौते के दौरान पाकिस्तानी नेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके शेर सुनाए थे।

मेरठ दंगों ने तोड़ा दिल, फिर भोपाल को बनाया आशियाना

साल 1987 के मेरठ सांप्रदायिक दंगों में इस महान शायर का घर पूरी तरह जला दिया गया था। मोहब्बत और भाईचारे का पैगाम देने वाले इस शायर का दिल इस घटना से बुरी तरह टूट गया और उन्होंने हमेशा के लिए मेरठ छोड़ दिया। इस हादसे के बाद वह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आकर बस गए और जीवन के आखिरी पल तक यहीं रहे।

पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से हुए सम्मानित

साहित्य और नाटक अकादमी में उनके शानदार और अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा साल 1999 में उन्हें 'पद्मश्री' से नवाज़ा गया था। इसके अलावा उन्हें उर्दू के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' भी मिल चुका था। 'उजाले अपनी यादों के', 'आस', 'रोशनी के घरौंदे' और 'उजालों की periyan' उनके प्रमुख ग़ज़ल संग्रह हैं।

Bashir Badr Death Reason: बकरीद के दिन शायर बशीर बद्र का कैसे हो गया निधन? किस बीमारी से जूझ रहे थे?
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