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धधक रहे हैं एमपी के जंगल

Fire in the forest of MP
लगता है सन्‌ 2009 का साल भविष्य में आने वाले संकट की ओर संकेत कर रहा है। एक तरफ तो गर्मी का पारा लगातार बढ़ रहा है तो दूसरी ओर जलसंकट धीरे-धीरे पूरे देश को अपने गिरफ्त में ले रहा है।

हालत इतने गंभीर हैं कि सर्वोच्च न्यायलय को जल संकट के मुद्दे पर केन्द्र सरकार के खिलाफ़ बहुत ही तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी, जो किसी भी स्वाभिवानी सरकार के लिए शर्म की बात हो सकती है। पर लगता है कि हमारी सरकार तो नाम की लोकतांत्रिक और लोक कल्याणकारी है, इसे अपने स्वार्थों की रोटी सेंकने से ही फुरसत नहीं है। अगर एक लोकतांत्रिक सरकार जनता को जीवन की बुनियादी जरुरतों को मुहैया करवाने में असमर्थ है तो ऐसे में एक तानाशाह सरकार और लोकतांत्रिक सरकार के बीच क्या अंतर है?

हम तो दम भरते हैं दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का, किन्तु हमारी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। सरिस्का के बाद पन्ना अभ्यारण्य से भी सारे बाघ गायब हो गये, लेकिन वन विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। इसी तरह पूरे देश में वनक्षेत्र लगातार कम होते जा रहे हैं, पर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। यह कैसा विकास है? हम विकास कर रहे हैं या खुद अपनी जड़ काट रहे हैं।

रोज जल रहे हैं जंगल

जिस तरह से प्रकृति के साथ रोज बलात्कार हो रहा है, इस तरह की विपरीत परिस्थिति में प्रकृति से राहत की उम्मीद करना निष्चित रुप से बेमानी होगा।
गर्मी और आग के बीच चोली-दामन का रिष्ता होता है। गर्मी में इंसान की छोटी सी भी गलती आग लगने का कारण बन सकती है। इस वर्ष तो गर्मी के तेवर प्रतिदिन एक नया र्कीतिमान स्थापित करने की जुगत में हैं। इस तारतम्य में गर्मी और इंसानी भूल के कारण एमपी के जंगलों में रोज आग लग रही है।
इंसान को तो खैर अपनी गलती की सजा एक न एक दिन अपना सर्वस्व खोकर चुकाना ही है, लेकिन इंसानी गलतियों का खामियाजा थोड़े-बहुत बचे-खुचे बेजुबान जंगली जानवरों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है। इसके साथ-साथ प्रकृति के बचे हुए धरोहर भी जंगल की आग में स्वाहा हो रहे हैं।

आग लगाने की परंपरा और कटान

रबी की फसल कटने के बाद और खरीफ फसल की तैयारी करने के पहले खेतों में अवांछित खर-पतवार और नरवाई को नष्ट करने के लिए खेतों में आग लगाने की परम्परा एमपी में वर्षों से चली आ रही है। जंगल से सटे खेतों में किसान जब आग लगाते हैं तो जंगल में आग की संभावना बढ़ जाती है। उल्लेखनीय है कि खर-पतवार और नरवाई को मध्यप्रदेश के सभी जिलों में खेतों में आग लगा करके नष्ट करने पर पाबंदी है। बावजूद इसके किसानों के द्वारा बिना किसी डर-भय के इस काम को अंजाम दिया जा रहा है, जिससे स्वाभाविक रुप से आगजनी की घटना लगातार बढ़ती जा रही है। इस संबंध में भोपाल सड़क मार्ग में वन विभाग के पास खर-पतवार और नरवाई जलाने के कारण आसपास के वन क्षेत्र में आग लगने का जिक्र करना समीचीन होगा। मुश्किल से स्थानीय पुलिसकर्मियों की मदद से इस आग पर काबू पाया गया था।

आग लगने की दूसरी वजह जंगलों की अवैध कटाई भी है। मध्यप्रदेष में हरे-भरे जंगल अमूमन नष्ट हो चुके हैं। बचे हुए पेड़ों के ठूंठ बहुत जल्द सूख जाते हैं। ऐसे में अगर लकड़ी चुनने वाले या अवैध कटाई करने वाले अनजाने में या जान-बूझ करके जंगल में जलता हुआ सिगरेट या बीड़ी फेंकते हैं तो जंगल में रोज आग तो लगेगी ही। रायसेन के एसडीओ वीके अतुलकर के अनुसार जंगलों में आग लगने की मुख्य वजहों में से एक है- शरारती तत्वों के द्वारा जंगल में आग लगाना।
तीन मई को रायसेन जिला से सटे विंध्याचल की वादियों में अचानक आग लग गई। यह आग जिला मुख्यालय से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोपालपुर रिपटा के नजदीक शांतिवन में लगी।

आग इतनी जबरदस्त थी कि इसने मिनटों में 100 से अधिक हरे-भरे पेड़ों, झाड़ियों और वनस्पतियों को जला करके खाक कर दिया। इतना ही नहीं इस आग ने विंध्याचल की वादियों को भी अपने पाष में जकड़ लिया। देखते-देखते पूरा वन धू-धू करके जलने लगा। वन कर्मचारी आग पर काबू करने में पूरी तरह से विफल रहे। यह क्षेत्र शहरी इलाके से लगा हुआ है। इस कारण यहाँ आग लगने की हमेशा संभावना बनी रहती है।

धधकता शांतिवन और विंध्याचल के जंगल

तीन मई के बाद पुन: छह मई को फिर से एक बार विध्यांचल के जंगलों में आग लग गयी। इस बार की आग शांतिवन में लगी और फैली आग से भी ज्यादा भयानक थी । अभी भी विध्यांचल की वादी धधक रही है। वन विभाग आग पर काबू पाने में अपने को असहाय पा रहा है। बहुमूल्य वनस्पतियां जल रही हैं। प्रकृति का संतुलन डगमगा रहा है। जंगली जानवर जंगल से पलायन करने पर मजबूर हैं। कुछ जानवर शहर का भी रुख भी कर रहे हैं।

पिछले 4-5 दिनों से कहीं न कहीं जंगलों में आग लग ही रही है। पहले षांतिवन में आग लगी। फिर घाटला के जंगलों में भीषण आग लगी। उसके बाद क्रमश: सीता तलाई और गोपालपुर के जंगलों में आग लगी। लगभग 1800 वर्ग किलोमीटर में फैले इन वन क्षेत्रों में आग ने करोडों की वनस्पतियों को तबाह कर दिया है। खास करके डामडोंगरी, बिनेका, चिकलोद, पैमत, बर्रुखार की घाटी और अमरावद डैम के आसपास का इलाका पूर्ण रुप से तबाह हो चुका है।

इनसानी भूल खतरनाक

ऐसा नहीं है कि इस तरह आग लगने की घटना पहली बार हो रही है। गर्मियों में आग तो जंगलों में प्रत्येक साल लगती ही हैं। कुछ महीनों पहले आस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी भीषण आग अभी भी हमारे जहन में जिंदा है। दरअसल गर्मी के दिनों में पेड़ों के पत्ते गिर जाते हैं और इन सूखे पत्तों में आग आसानी से पकड़ लेते हैं। आम तौर पर झाड़ियों में लगी आग आसानी से बूझ जाती है, लेकिन कभी-कभी ये आग तांडव भी मचा देते हैं।

जंगल में आग लगना वैसे तो सामान्य घटना है, परन्तु यह मानवजनित नहीं होना चाहिए। इंसानी भूल के कारण जंगलों में आग ज्यादा लग रही है। इसलिए इस पर काबू पाया जा सकता है। प्रकृति का ताना-बाना इस तरह का है कि यहाँ सब कुछ सुचारु रुप से चलता रहता है। गलतियों के लिए यहाँ बहुत कम गुंजाइश है। जरुरत इस बात की है कि इंसान अपनी बेलगाम और अतार्किक हरकतों से बाज आये।

[भारतीय स्टेट बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक सतीश कुमार सिंह स्वतंत्र लेखन करते हैं और मध्य प्रदेश के जुड़े मुद्दों पर विशेष रूप से लिखते हैं।]

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