आस्ट्रेलिया ने कबूला, हम नस्लवादी!

आखिर भारतीय छात्रों ने भी अपनी रक्षा खुद करना तय कर लिया है। वे टोलियां बनाकर अपने घरों और संपत्ति की हिफाजत करने लगे हैं। और इन हमलों को चुपचाप सहते जाने के बजाए, युद्ध को शत्रु के खेमे में ले जाकर उन्होंने एक 20-वर्षीय श्वेत नस्लवादी को चाकू भोंककर घायल भी कर दिया है। एक अन्य श्वेत नस्लवादी की कार को भी उन्होंने फूंक डाला है। ऐसा लग रहा है कि आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान-अफगानिस्तान में अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया है, कम-से-कम भारतीयों के लिए! आस्ट्रेलिया तेजी से भारतीयों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक स्थान बनता जा रहा है।
मामला हाथ से निकलता देखकर आस्ट्रेलिया को अग्नि-शमन का काम करना पड़ा रहा है। उसने टोकेनिज़म का सहारा लेते हुए पूर्वी आफ्रिका से आस्ट्रेलिया में आकर बसे भारतीय मूल के पीटर वर्गिस को राजदूत बनाकर भारत भेजा है। आस्ट्रेलिया पुलिस ने भी अपना रुख बदलकर इन हमलों के नस्लवादी स्वरूप को स्वीकारा है।
भारत में भी विरोध तेज
इधर भारत में भी इन हमलों के विरोध में कई तरह के पहल किए जा रहे हैं। सरकार तो अपना काम कर ही रही है, भारतीय नागरिक भी पीछे नहीं हैं। यहां अहमदाबाद में आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे बच्चों के माता-पिताओं ने अपना एक संघ बना लिया है, जिसका नाम है, अनिवासी भारतीयों के अभिभावकों का संघ। उसका कार्यालय आकाशदीप अपार्टमेंट, अंबावाडी, अहमदाबाद में स्थापित किया गया है।
यह संगठन उन लोगों को सदस्य बनने के लिए आमंत्रित कर रहा है, जिनके बच्चे आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे हैं। संघ का ध्येय है, जब भी किसी भारतीय पर हमला हो, तुरंत उसके शिकार हुए भारतीय मूल के व्यक्ति को मदद पहुंचाना और हर उपलब्ध मंच से इन हमलों का विरोध प्रकट करना।
यह संगठन इन हमलों को संयुक्त राज्य संघ में उठाने पर भी विचार कर रहा है। संगठन के अध्यक्ष दशरथ पटेल ने आस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त को पत्र भी लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है, “चूंकि आपकी सरकार ने हमारे बच्चों को आस्ट्रेलिया में पढ़ने के लिए वीजा दिया है, आपकी सरकार का यह फर्ज भी बनता है कि इन बच्चों की हिफाजत का इंतजाम भी करे और उन्हें इन हमलों से बचाए। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि बिना विलंब इन अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए।“
फिल्म उद्योग से भी प्रतिक्रिया
उधर अमिताभ बच्चन द्वारा आस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय की डाक्टरेट की पदवी ठुकरा देने के बाद हिंदी फिल्म उद्योग ने भी यह निश्चय कर लिया है कि वह आस्ट्रेलिया में शूटिंग नहीं करेगा। आस्ट्रेलिया में कई फिल्मों की शूटिंग हुई है, जैसे दिल चाहता है, सलाम नमस्ते, और बचना ए हसीनो। बोलीवुड फिल्मों की शूटिंग से आस्ट्रेलिया को आमदनी तो होती ही है, उससे भी ज्यादा ढेर सारी पब्लिसिटी भी मिलती है, जिससे उसकी छवि भी सुधरती है और उसके पर्यटन उद्योग को भी लाभ पहुंचता है। अब हिंदी फिल्म निर्माताओं द्वारा आस्ट्रेलिया को ब्लैकलिस्ट कर देने से आस्ट्रेलिया इन सब फायदों से वंचित रह जाएगा।
क्या करें हम और आप?
एक आम आदमी की हैसियत से भी हम आस्ट्रेलिया में हो रही नस्लवादी हिंसा का विरोध करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं –
आस्ट्रेलिया में बनी चीजों का बहिष्कार।
छुट्टियां मनाने आस्ट्रेलिया न जाना।
अपने बच्चों को आस्ट्रेलिया पढ़ने न भेजना।
वहां पढ़ रहे बच्चों को वापस बुला लेना।
आस्ट्रेलिया में बसने का विचार छोड़ना।
आईपीएल आदि खेल प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलिया की टीम टीवी पर आने या किसी विज्ञापन में आने पर टीवी बंद कर देना या चैनल बदल देना।
आस्ट्रेलिया के नस्लवाद के विरोध में अपने ब्लोगों में लिखना, अखबारों को इस विषय पर पत्र लिखना और आस्ट्रेलिया के अधिकारियों को ईमेल भेजना।
और भी कोई तरीका हो तो बताएं।
हमलों के पीछे की थ्योरी
इन हमलों को लेकर मेरी भी एक थ्योरी है जो दूर की कौड़ी हो सकती है, पर मुझे वजनदार लगती है।
मेरा मानना है कि आर्थिक मंदी से तबाह हुए यूरोप में आस्ट्रेलिया के श्वेत नस्लवादियों को आस्ट्रेलिया में यूरोपीय मूल के गोरे लोगों को अधिकाधिक संख्या में ले आने का अवसर दिख रहा है। याद रहे कि आस्ट्रेलिया अभी हाल तक घोषित रूप से “श्वेत ही आस्ट्रेलिया में बस सकते हैं" वाली नीति पर चल रहा था। उसे यह नीति दूसरे महायुद्ध के बाद इसलिए बदलनी पड़ी क्योंकि इस युद्ध के बाद यूरोप में नवनिर्माण कार्य शुरू हुआ और यूरोप के सभी श्रमिकों को इसी में काम मिल गया। इससे यूरोप के गोरे आस्ट्रेलिया आदि को उत्प्रवास करने को प्रस्तुत नहीं हुए।
झकमारकर आस्ट्रेलिया को अपनी नस्लवादी नीति बदलकर दूसरे देशों के लोगों के लिए भी आस्ट्रेलिया के दरवाजे खोलने पड़े। पर आस्ट्रेलिया में अभी भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो श्वेत आस्ट्रेलिया के सपने देखते हैं, उसी प्रकार जैसे भारत में कुछ लोग अब भी हिंदू राष्ट्र का सपना देखते हैं, हालांकि भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रभाव में आए 50 से भी अधिक साल हो चुके हैं।
अब यूरोप के सभी देशों की अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई है। वहां बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और मुफलीसी एक बार फिर प्रकट हो गई है। आस्ट्रेलिया के श्वेत नस्लवादियों को इसमें अवसर नजर आ रहा है। वे सोच रहे हैं कि इन तंग हाल यूरोपियों को आस्ट्रेलिया में आकर बसाया जा सकता है। लेकिन यह तभी हो सकेगा जब आस्ट्रेलिया में इनके लिए नौकरियां हों। आस्ट्रेलिया स्वयं भी इस आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था में और लोगों को नौकरी देने की क्षमता नहीं है। नौकरियां निर्मित करने का एक तरीका है भारतीयों पर हमले करके उन्हें डराना-धमकाना, ताकि वे आस्ट्रेलिया छोड़कर चले जाएं। उनके द्वारा खाली की गई जगहों पर यूरोप से आए श्वेतों को रखा जाए।
कुछ और देशों में भी उठेगा तूफान
पोलैंड, चेकोस्लाविया, हंगरी आदि निर्धन यूरोपीय देशों में आस्ट्रेलिया के एमिग्रेशन एजेंटों की कारगुजारी पर हमें नजर रखना चाहिए। यदि वहां पिछले कुछ महीनों में उनके क्रियाकलापों के बढ़ जाने के प्रमाण मिले, तो यह इसका पक्का सबूत होगा कि भारतीयों पर हमले एक सोची-विचारी व्यापक रणनीति के तहत किए जा रहे हैं, जिसका उद्देश्य भारतीयों को आस्ट्रेलिया से खदेड़ना है।
इस तरह के प्रयास अन्य देशों में भी पहले सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं, मसलन, युगांडा, कीनिया, फीजी, मोरीशियस, त्रिनिडाड, आदि। हमें इन देशों में अपने देशवासियों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए।
यदि हम आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों के सभी पक्षों पर बारीकी से विचार करते हुए अपनी रणनीति तय न करें, तो आने वाले कुछ दशकों में आस्ट्रेलिया से भी भारतीयों के पैर उसी प्रकार उखड़ जाएंगे, जैसे युगांडा, केनिया, आदि से उखड़े थे।
क्या लगता है आपको, आस्ट्रेलिया में हो रहे हमलों के पीछे यह साजिश भी हो सकती है?
[बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण एक स्वतंत्र लेखक, ब्लागर और अनुवादक हैं।]












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