Astrological Gemstones: रत्न धारण एवं चयन की नियम और शर्ते
लखनऊ। कुंडली में ग्रह दोषों को कम करने एवं नीच ग्रहों को बलवान करने के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय बताये गये हैं। उसी में से एक है रत्न उपचार विधि। ग्रहों को बलवान करने के लिए जातकों को रत्न धारण कराया जाता है, किन्तु रत्न धारण करने एवं चयन करने में किन-किन सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए ये भी अतिआवश्यक है।

ह के अंशों को जरूर देखना चाहिए
- कुण्डली में ग्रह के अंशों को जरूर देखना चाहिए।
- कुण्डली में ग्रह के उदय और अस्त पर जरूर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि अस्त ग्रह से सम्बन्धित रत्न पहनने से अस्त का फल न होकर ग्रह के उदय होने का फल मिलता है।
- कुण्डली में चल रही ग्रह की दशा, अन्तर दशा व उसकी गति पर ध्यान देना चाहिए।
- कुण्डली में कौन सा ग्रह पापी है कौन सा शुभ है और दृष्टि किसकी किस पर है, यह भी ध्यान देना चाहिए।
- ग्रह के विरोधी रत्नों को कभी धारण नहीं करना चाहिए बल्कि उनके मित्र रत्न ही धारण करने चाहिए।
उपरोक्त दिये गये नियमों के अलावा रत्न चयन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह विरोधी रत्नों के साथ न होकर अपने मित्र ग्रहों के साथ हो तो अधिक श्रेष्ठ होता है।
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वर्जित रत्न
- माणिक्य नीलम, लहसुनिया, गोमेद
- मोती गोमेद, हीरा, पन्ना, नीलम, लहसुनिया
- मॅूगा हीरा, पन्ना, नीलम, लहसुनिया
- पन्ना मोती और मूॅगा
- पुखराज हीरा, नीलम, गोमेद
- हीरा माणिक्य, मोती, पूखराज, मूंगा
- नीलम माणिक्य, मोती, पुखराज, मूंगा

ग्रह युद्ध करते हैं रत्न
इस प्रकार से ग्रह रत्नों को ध्यान में रखकर अन्य ग्रहों के वर्जित रत्नों को पहनना नहीं चाहिए क्योंकि यह ग्रह क्रय से एक दूसरे के बलाबल को नष्ट करते है और आपस में ग्रह युद्ध करते है जिससे जातक को हानि पहुंच सकती है।












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