Kundali: संतान प्राप्ति में बाधा बनता है पंचम स्थान का राहु
नई दिल्ली, 02 जून। ग्रहों में राहु को आकस्मिक फल देने वाला कहा गया है। अच्छा हो या बुरा, राहु सदैव अचानक ही फल प्रदान करता है। राहु शुभ फल देगा या अशुभ, यह जन्मकुंडली के विभिन्न भावों में उसकी उपस्थिति के अनुसार निर्धारित होता है।

- प्रथम भाव में : राहु यदि जन्मकुंडली के प्रथम भाव में हो तो जातक धनी, साहसी, बलवान, दयालु, अल्पसंततिवान, दुर्जन, क्रूर, मस्तिष्क विकार, सिर या मुख पर चिह्न, लंबा किंतु रोगी एवं क्षीणकाय, निम्न से उच्च श्रेणी तक उन्नति करने वाला, अल्पभाषी, स्त्री नाशक, द्विभार्या होता है।
- द्वितीय भाव में : कुविचारी, निर्धन, हकलाकर बोलने वाला, धन हानि करने वाला, प्रवासी, क्रोधी स्वभाव वाला, द्विअर्थी भाषा बोलने वाला होता है। ऐसा जातक कुटुंबहीन, कुविचारी, भाई को कष्ट देने वाला तथा भाई से कष्ट पाने वाला होता है।
- तृतीय भाव में : तीसरे भाव में स्थित राहु जातक को साहसी, पराक्रमी, प्रतिष्ठिक, चित्रकला एवं फोटोग्राफी में विशेष अभिरुचि, उद्योगी, समृद्धिशाली, लघुभ्राता वाला किंतु भाई-बहनों स दुखी, भ्रमणशील, विदेश यात्रा करने वाला, योगाभ्यासी, विवेकी, प्रवासी, बुद्धिमान, व्यवसायी होता है।
- चतुर्थ भाव में : चौथे भाव में राहु हो तो जातक दुराचारी, दुखी होता है। माता के लिए अरिष्टकर, चिंतित, परिश्रमी, विदेशी भाषाओं का ज्ञान रखने वाला, लंपट, पिता को आर्थिक हानि देने वाला, पिता के दो विवाहों की संभावना। कम सुखी।
- पंचम भाव में : संतान प्राप्ति में बाधक एवं कष्टकारक, क्रूर स्वभाव, प्रथम गर्भपात या प्रथम संतान को अरिष्टकारक होता है। क्रोधी, हृदय रोग एवं उदर व्याधिकारक, तीव्र बुद्धि, विद्या अध्ययन में बाधक, पूर्ण नीतिज्ञ, सट्टा-लाटरी में रुचि रखने वाला।
- छठे भाव में : रोगी, शत्रुनाशक, मातृपक्ष के लिए अनिष्टकारी, साहसी प्रभावशाली, अनुकूल अवसर पर ही बोलने वाला, बलवान, कमर एवं दांत के रोग से पीड़ित। विधर्मियों से लाभ, पराक्रमी, बाल्यकाल में दुखी।
- सप्तम भाव में : कामी, संकीर्ण विचारधारा वाला, चतुर या दुर्बल पत्नी, वैवाहिक जीवन में विषादमय, विधर्मियों से लाभ पाने वाला, ख्यातिवान, समृद्धिशाली, प्रवासी, प्रमेह-मधुमेह, गुप्तरोग से पीड़ित, परस्त्रीगामी-परपुरुषगामी, पत्नी को अनिष्टकारी।
- अष्टम भाव में : अनैतिक कार्यो में रत, लांछित, रोगी, दुर्जन, प्रवासी, मलिन मन, दुखी, गुप्त रोग से पीड़ित, कपटी, कठोर परिश्रमी, पुष्टदेह, क्रोधी, उदर रोगी, उदर व्याधियुक्त, शत्रु युक्त होता है।
- नवम भाव में : नवें भाव में राहु हो तो जातक अल्पसंतततिवान, पत्नी भक्त, विदेश यात्रा करने वाला, तीर्थाटनशील, धार्मिक प्रवृत्ति वाला, राज्य सम्मान प्राप्त, वृद्धावस्था में पुत्र सुख, प्रवास में दुराचार, भ्रातृहीन, व्यर्थ श्रम वाला होता है।
- दशम भाव में : राज्याधिकार प्राप्त, कठोर प्रशासक, विद्वान, साहित्यिक, परस्त्रीगामी, प्रतिभाशाली, ख्याति प्राप्त, जीवन के उत्तरार्द्ध में आशातीत सफलताएं प्राप्त करने वाला एवं महत्वाकांक्षी, पिता को अरिष्ट, आलसी, वाचाल, संतान से दुखी।
- एकादश भाव में : धनी, समृृद्धिशाली, कान के रोग से पीड़ित, अनायास एवं अनैतिक माध्यमों से धन लाभ, पिता एव ंसतान पक्ष से चिंतित, निम्न वर्ग में प्रभावशाली, चर्मरोगी, सट्टा- लाटरी से लाभ। परिश्रमी, लोभी होता है।
- द्वादश भाव में : विवेकहीन, पाप कर्मरत, अपव्ययी, चिंतित, नेत्र दृष्टि रोगी, विषादमय, यौगिक क्रियाओं में विशेष रुचि, मंदमति, सेवक, कामी, स्त्री क्लेशी होता है।












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