जानिए... वक्री गुरु का कुंडली के अलग-अलग भावों में क्या होता है असर

नई दिल्ली। अनेक जातकों की जन्मकुंडली में कोई न कोई ग्रह वक्री हो सकता है। जन्म लग्न, राशि और अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार वक्री ग्रह जातक के जीवन में अलग-अलग प्रकार से फल देते हैं। इनमें शुभ ग्रह जैसे बुध, चंद्र, गुरु वक्री हों तो जातक पर कई तरह के प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलते हैं। यदि जन्मकुंडली के साथ गोचर में भी कोई ग्रह वक्री हो जाए तो जातक पर विपरीत असर पड़ सकता है। आज हम बात कर रहे हैं वक्री गुरु की। 22-23 अप्रैल को बृहस्पति वक्री हो रहा है और यदि आपकी जन्मकुंडली में भी बृहस्पति वक्री बैठा हुआ है तो उसका क्या असर होगा।

वक्री गुरु का फल

वक्री गुरु का फल

वक्री गुरु वाले जातक आमतौर पर अन्य लोगों से अलग होते हैं। ये प्रायः उस कार्य में सफलता अर्जित कर लेते हैं जिसमें दूसरे लोग फेल हो जाते हैं। जहां दूसरे लोग थक हार जाते हैं, वहां से वक्री गुरु वाले लोग कार्य प्रारंभ करते हैं और उसमें सफल होते हैं। ऐसे लोग एक सफल मैनेजमेंट जानने वाले होते हैं। ये बंद हो चुकी परियोजनाओं में हाथ डाले तो उसमें भी जान आ जाती है। वक्री गुरु वाले जातक दूरदर्शी होते हैं तथा जल्दबाजी में विश्वास नहीं रखते।

वक्री गुरु प्रथम भाव में

किसी जातक की जन्मकुंडली में यदि लग्न या प्रथम भाव में गुरु वक्री हो तो जातक किसी के प्रति ठीक से न्याय नहीं कर पाता है। ऐसे व्यक्ति में ईमानदारी और समझ की कमी होती है। कई बार दूसरों को पहचानने में लगती कर बैठते हैं और इसी कारण खुद का नुकसान कर बैठते हैं। ऐसा व्यक्ति निरोगी तथा सुंदर शरीर वाला होता है।

जन्मकुंडली

जन्मकुंडली

जन्मकुंडली के द्वितीय भाव में गुरु वक्री हो तो जातक आर्थिक मामलों को ठीक से मैनेज नहीं कर पाता है। ऐसा व्यक्ति पैतृक संपत्ति का नाश कर कर बैठता है। बेतहाशा खर्च करता है। ऐसा व्यक्ति यदि आर्थिक मैनेजमेंट सही कर ले तो फिर राजा के समान जीवन बिता सकता है। इसे कुटुंब व पत्नी से अच्छा सुख मिलता है।

वक्री गुरु तृतीय भाव में

तीसरे भाव में वक्री गुरु होेने पर जातक शैक्षणिक कार्यों में लापरवाह रहता है। ऐसा व्यक्ति कई बार नास्तिक देखा गया है तथा इसे धार्मिक संस्कारों और रीति रिवाजों के प्रति उदासीनता होती है। जातक की निर्णय क्षमता भी कमजोर होती है और छोटे-छोटे निर्णय लेने में भी दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। इनमें दूसरों के प्रति पूर्वाग्रह भी बहुत होता है।

वक्री गुरु चतुर्थ भाव में

वक्री गुरु चतुर्थ भाव में

चौथे भाव में गुरु वक्री होने पर जातक में अहंकार व घमंड होता है। जातक असामाजिक हो जाता है। आत्ममुग्धता की भावना अधिक होने के कारण यह जातक दूसरों को कुछ नहीं समझता है और अपना निर्णय दूसरों पर लादने का प्रयास करता है। यदि जातक पूर्वाग्रह छोड़कर अपना व्यवहार उदार कर ले तो सभी इनके मित्र बन जाएंगे।

वक्री गुरु पंचम भाव में

जिस जातक की जन्मकुंडली के पंचम भाव में वक्री गुरु हो उसका अपने बच्चों के प्रति अधिक लगाव नहीं होता है। ऐसा जातक अपनी पत्नी में अधिक रुचि ना लेते हुए पराई स्त्रियों की ओर आकृष्ट रहता है। इन्हें गुप्त रोग भी घेर लेते हैं। पंचम स्थान का गुरु विफल माना गया है। यह जातक के संतान सुख में बाधा बनता है।

वक्री गुरु षष्ठम भाव में

छठे भाव का वक्री गुरु जातक को अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह बनाता है। ये दिखने में तो तंदुरुस्त होते हैं लेकिन भीतर ही भीतर इन्हें डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, लिवर संबंधी रोग घेरे रहते हैं। इतना होने के बावजूद ये खानपान का ध्यान नहीं रखते और रोगों से घिरते चले जाते हैं। जातक आय के साधनों के प्रति भी उदासीन होता है।

वक्री गुरु सप्तम भाव में

वक्री गुरु सप्तम भाव में

सप्तम भाव का वक्री गुरु अपने जीवनसाथी के प्रति ज्यादा विश्वस्त नहीं होते। ये आत्मकेंद्रित ज्यादा होते हैं और व्यक्तिगत सुख के अलावा इन्हें किसी दूसरे की परवाह नहीं होती। ऐसे जातक कंजूस प्रवृत्ति के होते हैं। हालांकि कई बार सप्तमस्थ वक्री गुरु वाला जातक विवाह के बाद नौकरी में उच्च पद हासिल करता है।

वक्री गुरु अष्टम भाव में

अष्टम भाव में वक्री गुरु जातक को रहस्यमयी व्यक्तित्व देता है। ऐसा व्यक्ति तंत्र-मंत्र, जादू टोने में विश्वास रखता है। इस जातक का कोई कार्य सीधे तरीके से नहीं होता और कार्यों का अंत भी बेहद बुरी तरह से होता है। यदि आठवां गुरु वक्री हो और शुभ ग्रहों से युक्त हो तो जातक को पैतृक धन संपत्ति मिलती है।

वक्री गुरु नवम भाव में

नवम भाव धर्म और भाग्य स्थान होता है। इस भाव में गुरु वक्री होने पर जातक धर्मभीरू और धर्मांध होता है। व्यर्थ के कर्मकांडों और अनुष्ठानों में उलझा रहता है। ऐसे जातक अपनी व्यक्तिगत मान्यताएं बना लेते हैं और उनके आगे किसी और की नहीं सुनते। ये सामाजिक कार्यों में तभी रुचि लेते हैं जब उसमें इनका कोई व्यक्तिगत हित हो।

वक्री गुरु दशम भाव में

दशम स्थान कार्य स्थान होता है। यदि किसी जातक की जन्मकुंडली के दशम स्थान में वक्री गुरु हो तो उसकी विरोधी गतिविधियां ही उसके कार्य में बाधक बनती है। जातक के कमजोर निर्णय, गैर जिम्मेदार हरकतें खुद के परिवार की निगाह में ही गिरा देती है। ऐसे जातक नौकरी में रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं।

वक्री गुरु एकादश भाव में

जिस जातक की जन्मकुंडली के 11वें स्थान में गुरु वक्री होकर बैठा हो उसकी दोस्ती निन्म स्तरीय लोगों से होती है। कम पढ़े-लिखे, शराबी और व्यसनी लोगों के बीच ये उठते-बैठते हैं। गलत कार्यों की वजह से खुद पतन की ओर बढ़ते जाते हैं।

वक्री गुरु द्वादश भाव में

द्वादश स्थान में वक्री गुरु हो तो जातक अवसरों को ठीक समय पर पहचान नहीं पाता और कई बार अच्छे मौके हाथ से छूट जाते हैं। ये अपना धन, समय और श्रम बेकार के कार्यों में नष्ट करते रहते हैं। स्वयं की कमजोरी के कारण कई कार्यों में पीछे रह जाते हैं।

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