Astro Tips: रत्नों और धातुओं से दूर हो सकते हैं रोग

चाहे कोई माने या ना माने लेकिन प्रत्येक ग्रह से सम्बद्ध रत्न और उपरत्न ग्रह दशा ठीक करने में काम आते हैं।

नई दिल्ली। रत्नों का मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। चाहे कोई माने या ना माने लेकिन प्रत्येक ग्रह से सम्बद्ध रत्न और उपरत्न ग्रह दशा ठीक करने में काम आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं इन्हीं रत्नों का प्रयोग रोगों को ठीक करने में भी किया जाता है। न सिर्फ रत्नों को धारण करने से बल्कि एक योग्य वैद्य के मार्गदर्शन में इनकी भस्म का सेवन करने से भी रोग जल्दी ठीक हो जाते हैं।

ज्योतिषीय भाषा में इसे रत्न चिकित्सा कहा जाता है। कई वैज्ञानिक शोधों में भी यह साबित हो चुका है कि रत्नों का प्रयोग रोगों का शमन करने में सक्षम है।

आइये जानते हैं कौन-सी बीमारी पर कौन-सा रत्न अपना असर दिखा सकता है...

पेप्टिक अल्सर

पेप्टिक अल्सर

पाचक क्षेत्र के भीतर होने वाला कोई भी विकार या थोड़ा पेप्टिक अल्सर कहलाता है। पेट की झिल्ली में अम्लों के दुष्प्रभाव से अल्सर होता है। अत्यधिक धूम्रपान, शराब, अधिक तेल-मसाले युक्त भोजन, तले हुए भोजन के सेवन से पेप्टिक अल्सर होता है। इसका लक्ष्ण यह है कि पेट के उपरी भाग में लगातार दर्द बना रहता है। कुछ भी खाने के बाद पेट दर्द होता है। ज्योतिषीय मत के अनुसार लग्नेश या लग्न पर जब शनि या मंगल की दृष्टि हो तो अल्सर होता है। कर्क या कन्या राशि में शनि या केतु होने पर, पांचवें भाव में मंगल की उपस्थिति होने से सूर्य या केतु के आक्रांत होने पर पेप्टिक अल्सर होने की आशंका रहती है। इस रोग से निवारण के लिए पन्ना या पीला नीलम मध्यमा या अनामिका अंगुली में धारण करें। रोग गंभीर हो तो माणिक्य या मूंगे की भस्म औषधि के रूप में सेवन करें। साथ में मून स्टोन भी धारण किया जा सकता है।

गठिया

गठिया

यह जोड़ों का एक रोग है, जिसमें व्यक्ति के ज्यादातर पैरों के जोड़ जैसे घुटनों, टखनों, पंजों, कूल्हो में दर्द होता है। इस रोग में प्रभावित अंग की त्वचा के नीचे सफेद क्रिस्टल जमा हो जाते हैं। शरीर में यूरिक एसिड का संतुलन गड़बड़ा जाता है और रक्त में इसकी अधिक मात्रा हो जाती है तो गठिया होता है। यह रोग 45 वर्ष से अधिक आयु वालों में पाया जाता है। ज्योतिष के अनुसार मिथुन, तुला, कुंभ राशि के व्यक्ति इस रोग से अधिक पीडि़त होते हैं। बृहस्पति लग्न में तथा शनि सप्तम भाव में हो तो गठिया होने की प्रबल आशंका रहती है। वृषभ, सिंह, कन्या, मकर तथा मीन राशियों में शनि-राहु का योग और मंगल की सीधी दृष्टि हो तो वात रोग होने की निश्चित आशंका रहती है। सूर्य का कमजोर होना भी गठिया का प्रमुख कारण है। इस रोग को दूर करने के लिए शरीर से स्पर्श करता हुए स्वर्ण या तांबा धारण किया जाता है। गोमेद तथा पीला पुखराज रोग को बढ़ने से रोकता है।

मुहांसे

मुहांसे

किशोरावस्था के लड़के-लड़कियां मुहांसों से सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं। मुहांसे आमतौर पर पेट की गंदगी और रक्त की अशुद्धता के कारण होता है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था में आने के दौरान शरीर में रासायनिक तत्वों और हार्मोन का संतुलन बिगड़ता जिससे चेहरे पर फुंसी, कील, दाग-धब्बे आते हैं। विशेष रसायनों के उत्सर्जन से चेहरे पर चिकनाई की मात्रा अधिक हो जाती है। धूल-मिट्टी के संक्रमण से भी मुहांसे होते हैं। ज्योतिषीय मत के अनुसार मेष तथा वृश्चिक राशि के जातक मुहांसों से अधिक पीडि़त होते हैं। अशुभ शुक्र और केतु का भ्रमण मेष, तुला और मकर राशियों में हो तथा इन पर शत्रु ग्रहों की दृष्टि हो तो भी मुहांसे होते हैं।
मुहांसों से बचने के लिए चांदी की अंगूठी में 4 से 6 रत्ती का मोती मध्यमा अंगुली में धारण करें। कनिष्ठिका में लाजवर्त धारण करें। चांदी की अंगूठी में 8 से 10 रत्ती का सफेद मूंगा भी पहना जाता है।

सिरदर्द

सिरदर्द

सिरदर्द से प्रायः प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी परेशान होता है। तनाव, चिंता, अवसाद, भावुकता, निरंतर श्रम करना, अधिक समय तक खाली पेट रहना, रात में देर तक जागना, तेज धूप में बाहर निकलना, आंखे कमजोर होना आदि इसके प्रमुख कारण है। वैसे तो सिरदर्द पेनकिलर लेने से बंद हो जाता है, लेकिन यदि किसी को लगातार प्रतिदिन सिरदर्द होता है तो उसका उचित इलाज किया जाना जरूरी है।
बुध ग्रह स्नायुओं का कारक है। चंद्र लग्न पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो सिरदर्द की शिकायत रहती है। सूर्य और चंद्र पर शनि, मंगल की कुदृष्टि होने से तीव्र सिरदर्द होता है। मेष राशि पर शनि, राहु, केतु की दृष्टि से आधे सिर में दर्द होता है। मंगल-राहु तथा सूर्य-शनि का योग भी इस रोग का कारण है।
सिरदर्द से छुटकारा पाने के लिए माणिक्य, मोती तथा पन्ना धारण करें। नीलम या पुखराज चांदी या तांबे की अंगूठी में पहनें। नवरत्न का पेंडेंट भी गले में धारण किया जा सकता है।

एनीमिया

एनीमिया

शरीर में खून की कमी को एनीमिया कहा जाता है। लौह तत्वों की कमी से होने वाला यह रोग आजकल के युवाओं में अधिक पाया जा रहा है। पौष्टिक भोजन की कमी और फास्ट फूड के अधिक सेवन से शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा नहीं मिल पाती है। इनमें रक्त बढ़ाने वाला प्रमुख तत्व आयरन भी है, जिसकी कमी से एनीमिया होता है। स्त्रियों को मासिक धर्म के समय अधिक रक्तस्राव की वजह से भी एनीमिया की शिकायत हो जाती है। ज्योतिष मत के अनुसार केतु और त्रिकोण भावों का ग्रहविहीन होना इस रोग को जन्म देता है। सूर्य तथा शनि की पीडि़तावस्था में पाचन शक्ति की कमजोरी से यह रोग होता है। वृषभ, सिंह तथा कुंभ राशियों में राहु-केतु की उपस्थिति से रक्ताल्पता हो जाती है। बृहस्पति सिंह राशि में मंगल से छठे, आठवें या 12वें भाव में या कर्क राशि में बैठा हो तो रक्त की कमी हो जाती है।
इस रोग के उपचार के तौर पर कलाई में लोहे का कड़ा पहनें। पांच रत्ती का मूंगा तथा 5 से 7 रत्ती का पुखराज सोने या चांदी की अंगूठी में दाएं हाथ में धारण करें।

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