दीपावली- देखें कब और कैसे करें पूजन
दीपावली रात्रि जागरण का पर्व है। स्वयं को जगाना यानि अपनी आत्म चेतना के प्रकाश को जाग्रत करके जगत की अन्धकार रूपी माया में र्इमानदारी, सदबुद्धि, परोपकार, सत्यनिष्ठा, सकारात्मकता, राष्ट्र्रधर्म एंव नैतिकता की लौ जलाना। जैसे सूर्य अपने प्रकाश से सात रंगों की किरणों को बिखेर कर पूरे संसार को जाग्रत कर देता है, उसी प्रकार से कार्तिक मास की अमावस्या की घोर काली रात्रि को अग्नि के लघु रूपी दीपकों की ज्योति पूरे अन्धकार को प्रकाश में परिवर्तित करके मा लक्ष्मी का भव्य स्वागत व नमन करती है।
हिन्दूओं के बड़े त्यौहारों में अधिकतर त्यौहार पूर्णिमा तिथि में मनाने की परम्परा है। दीपावली ही एक ऐसा पर्व है, जो अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि दशरथ पुत्र राम जब लंका जीतकर अयोध्या लौटे तो अयोध्या वासी रामचन्द्र जी को देखने के लिए लालयित थे, उस काल में बिजली आदि की व्यवस्था नहीं थी इसलिए चहुओर दीपों को जलाकर जनमानस ने दीपों का प्रकाश उत्सव मनाकर रामचन्द्र जी का भव्य स्वागत किया। जब एक राजा दूसरे राज्य पर विजय प्राप्त करके लौटता है, तो वहां से प्रचुर मात्रा में धन-दौलत लेकर वापस आता है, और अपनी प्रजा में उसका वितरण करता है। शायद यही अकांक्षा अयोध्यावासियों में रही होगी किन्तु जब यह आशा निराशा में तब्दील हुयी तो अयोध्या की गरीब जनता ने रामचन्द्र जी पर तरह-तरह के आरोप लगायें ?
दिवाली पर शुभ आयुष्मान योग का संयोग- दीप प्रज्जवलन कार्तिक अमावस्या तिथि में करने का विशेष महत्व है। इस दिन स्वाति नक्षत्र सूर्योदय से रात्रि 11:02 मि0 तक रहेगा जबकि आयुष्मान योग दिवस पर्यन्त रहेगा।
क्यों जगाया जाता है मां लक्ष्मी ?
किसान अपनी उपजाऊ भूमि पर अग्नि को जलाकर धरती मां से जागने की प्रार्थना करते है। दीपदान के पश्चात सोर्इ हुई लक्ष्मी को हाथ में दीपक लेकर स्त्रियां जगाती है। क्षीर सागर में पालनकर्ता भगवान विष्णु को सोया देखकर लक्ष्मी जी ब्राहम्णों से अभय प्राप्त करके कमल में रहने लगी। उसी लक्ष्मी को आज महिलायें, व्यापरी, किसान आदि हाथ में दीपक लिए भगवान विष्णु से पहले जागने की प्रार्थना करते है। जैसे महिलायें ब्रहमकाल में पतियों से पहले जागती है, वैसे ही लक्ष्मी जी भी अपने पति भगवान विष्णु से 12 दिन पहले जागती है।
मिटटी के दीयें ही क्यों जलाना चाहिए ?
दीपावली के पर्व में दीपक की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। मिट्टी के दीपकों का महत्व इसलिए अधिक होता है क्योंकि इसमें पाचों तत्व पाये जाते है। मिट्टी में- आकाश, जल, अग्नि, वायु व पृथ्वी तत्व निहित होते है। हिन्दू त्यौहारों में पाच तत्वों की उपसिथत अपरिहार्य मानी गर्इ है। पारम्परिक दीपकों की रोशनी पर चाइनीज झालरें, मोमबतितयों आदि ने कब्जा कर रखा है, जिसके कारण कुम्भकार का पारम्परिक व्यवसाय धरातल में चला गया है। अत: आप सभी आर्टीफीशियल रोशनी का प्रयोग न करके मिट्टी के दीयों प्रयोग करें।
पूजन का शुभ मुहूर्त- इस वर्ष दीपावली 03 नवम्बर सन 2013 को कार्तिक कृष्ण अमावस्या को मनार्इ जायेगी। इस दिन अमावस्या सायं 6:19 मि0 तक रहेगी। दीपावली का मुख्य पूजन प्रदोष काल में माना जाता है। इस दिन प्रदोष काल सायं5:44 मि0 से से 08:14 मि0 तक है। स्थिर लग्न में पूजन करने वालों के लिए प्रथम स्थिर लग्न वृष सायं 6:27 मि0 से 08:28 मि0 तक रहेगी। दूसरी सिथर लग्न सिंह रात्रि 12:58 मि0 से सुबह 03:30 मि0 तक है। महानिशीथ काल रात्रि 11:35 मि0 से 12:25 मि0 तक है।
दीवाली पर कुछ विशेष लाभकारी उपाय-
1- दीपावली की रात्रि में पूजन के समय 21 हकीक के पत्थरों का भी पूजन करना चाहिए। पूजन करने के पश्चात उन्हें अपने निवास में कहीं भी गाड़ देना चाहिए। ऐसा करने से वर्ष भर देवी लक्ष्मी का स्थायी वास रहता है।
2- दीपावली के पूजन के समय 501 ग्राम सूखे छुआरों को लाल कपड़े में बाधकर धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए। 51 दिवस तक निरन्तर कुछ रूपये माता के मंदिर में मां लक्ष्मी के नाम से अर्पित करना चाहिए तथा मां लक्ष्मी से सम्पित्ति,सम्पन्नता का निवेदन करना चाहिए।
3- दीपावली के पूजन के समय मां लक्ष्मी की पुरानी तस्वीर पर अपनी पत्नी के हाथ से पूर्ण सुहाग सामग्री अर्पित करें। दीपावली के अगले दिन आपकी पत्नी स्नान करने के पश्चात उस सामग्री को मां लक्ष्मी का प्रसाद मानकर ग्रहण कर ले तथा उसका स्वयं प्रयोग कर मां लक्ष्मी को अपने घर में स्थायी वास करने का निवेदन करें तो पूरे वर्ष मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।
4- दक्षिणावर्ती शंख का पूजन दीपावली में विधिवत करने से प्रचुर मात्रा में धन आता है। दक्षिणावर्ती शंख का षोडशोपचार पूजन करने के पश्चात निम्न मन्त्र की 5 माला का जाप करना चाहिए- ऊ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीधरकस्थाय पयोनिधिजाताय श्री दक्षिणावर्तशंखाय ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीकाराय पूज्याय नम:
5- दीपावली के पूजन से पूर्व किसी भी दिन निर्धन सुहागिन स्त्री को सुहाग सामग्री देनी चाहिए। इस उपाय को करने से मा लक्ष्मी प्रसन्न होती है।
6- दीपावली के दिन सायंकाल में मां लक्ष्मी या दुर्गा जी के मंदिर में दो जगह सवा सौ ग्राम रोली, इतना ही सिन्दूर, सवा मीटर लाल कपड़ा, नारियल व कुछ रूपये रखकर पूजन करना चाहिए। पूजन के पश्चात एक स्थान की सामग्री मंदिर में ही अर्पित करें और दूसरे स्थान की सामग्री स्वयं लाल कपड़ें में बांधकर अपने धन रखने के स्थान पर रख दें। इस उपाय को करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होकर घर में वास करती है। विष्णु शकित: परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविधा कर्मसंज्ञान्या तृतीया शकितरिष्यते।।
नरक चतुदर्शी -
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को सूर्योदय के समय स्नान अवश्य करना चाहिए। क्योंकि ऐसी मान्यता है कि जो व्यकित इस दिन प्रात: काल स्नान करता है, उसे यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता है। अपामार्ग, लौकी और जायफल इनको स्नान के समय मस्तक पर घुमाना चाहिए। इससे नरक के भय का नाश होता है। उस समय इस प्रकार की प्रार्थना करें- हे अपामार्ग, मैं हरार्इ के टेले, काटे और पत्तों के सहित तुम्हें बार-2 मस्तक पर घुमा रहा हूं। मेरे द्वारा जाने-अनजाने में किये गये पापों को नष्ट करें।
तत्पश्चात यमराज के नामों का तीन-2 बार उच्चारण करके तर्पण करें। यहां तक कि जिसका पिता जीवित हो उसको भी यह तर्पण करना चाहिए। यमराज के नाम निम्न प्रकार से है- यमाय नम:।। धर्मराजाय नम:।। मृत्यवे नम:।। अन्तकाय नम:।। वैवस्वताय नम:।। कालाय नम:ं।। सर्वभूतक्षाय नम:।। औदुम्बराय नम:।। दध्नाय नम:।। नीलाय नम:।। परमेषिठने नम:।। वृकोदराय नम:।। चित्राय नम:।। चित्रगुप्ताय नम:।।
देवताओं का पूजन कर दीपदान करना चाहिए। ब्रहमा, विष्णु और महेश आदि के मंदिरों में गुप्त गृहों, रसोर्इघर, स्नानघर, देववृक्षों के नीचे, सभा भवन में, नदियों के किनारे, चहारदीवारी पर, बगीचे में, गली-कूची में एंव गौशाला में भी दीप जलाना चाहिए। जो मनुष्य इस तिथि में अरूणोदय के पश्चात स्नान करता है, उसके वर्ष भर के शुभ कार्यो का नाश हो जाता है। दीपदान विधि त्रयोदशी से अमावस्या तक करना चाहिए। क्योकि वामन भगवान ने क्रमश: इन्हीं तीन दिनों में राजा बलि को पृथ्वी को नापने के पश्चात बलि से वरदान मागने को कहा था।
उस समय बलि ने प्रार्थना की थी- महराज मुझको तो किसी वर की आकांक्षा नहीं, किन्तु लोककल्याण के निमित्त एक वरदान मागता हुं- अर्थात कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावस्या। इन तीन दिनों में आपने मेरा राज्य नापा है। अत: जो भी मनुष्य मेरे राज्य में चुतर्दशी के दिन यमराज के हेतु दीपदान करें। उसके घर में मा लक्ष्मी का वास सदा बना रहें। राजा बलि प्रार्थना सुनकर भगवान ने कहा- एवमस्तु जो मनुष्य इन तीन दिनों में दीपोत्सव और महोत्सव करेगा, उसको छोड़कर मेरी प्रिया लक्ष्मी नहीं जायेंगी।
अन्नकूट-गोवर्धन पूजा-
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा की जाती है। यह प्रतिपदा अमावस्या के बाद वाली ( पूर्वविद्धा ) ली जानी चाहिए क्योंकि जिस दिन चन्द्रदर्शन हो, उस दिन गोवर्धन पूजा निषेध है। दीपावली की तरह इसमें भी दीपोत्सव का विधान है। गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में इसी दिन से नव वर्ष की शुरूआत होती है। यह वैष्णवों का मुख्य पर्व है और इसका आयोजन कृष्ण मंदिरों एवं विष्णु मंदिरों और आस्तकि गृहस्थों के घर में किया जाता है। यह पर्व वज्र भूमि में अधिक लोकप्रिय है।
इस पर्व को दो भागों में विभक्त किया गया है।
गोवर्धन पूजा-
इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन का चित्र बनाकर उसकी पूजा रोली, चावल, खीर, बताशे, चावल, जल, दूध, पान, केसर, पुष्प आदि से दीपक जलाने के पश्चात की जाती है। गायों को स्नानादि कराकर उन्हें सुसजिजत कर उनकी पूजा करें। गायों को मिष्ठान खिलाकर उनकी आरती कर प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
अन्नकूट-
अन्नकूट शब्द का अर्थ होता है अन्न का समूह। विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित करने के कारण ही इस उत्सव या पर्व को नाम अन्नकूट पड़ा है। इस दिन अनके प्रकार का पकवान, मिठार्इ आदि का भगवान को भोग लगायें। सभी नैवेधों के बीच भारत का पहाड़ अवश्य बनायें। भोग सामग्री की इतनी विविधता और विपुलता होनी चाहिए, जितनी बनार्इ जा सकें। अन्नकूट के रूप में अन्न और शाक- पकवानों को भगवान को अर्पित किये जाते है तथा भगवान को अर्पण करने के पश्चात वह सर्वसाधारण में वितरण किया जाता है। कृषि प्रधान देश का यह अन्नमय यज्ञ वास्तव में सर्वसुखद है। अन्नकूट और गोवर्धन की यह पूजा आज भी कृष्ण और बिष्णु मनिदरों में अत्यन्त उत्साह से की जाती है।
राशियों के मुताबिक मन्त्र का जाप करके मां लक्ष्मी को प्रसन्न करें-

मेष
ऊ श्रीं ह्री ऐं महालक्ष्म्यै कमलाधारिणयै सिंहवाहिन्यै स्वाहा।

वृष
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।

मिथुन
ऊ ऐं श्रीं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै गरूणवाहिन्यै श्रीं ऐं नम:।

कर्क
ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं।

सिंह
ओं ह्रीं हूं हां ग्रें क्षों क्रों नम:।

कन्या
ऊ नम: कमलवासिन्यै स्वाहा।

तुला
ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नम:।

वृशिचक
ऊ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम:।।

धनु
श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै नम:।

मकर
ऐं ह्रीं श्रीं आधलक्षिम स्वयंभुवे ह्रीं ज्येष्ठायै नम:।

कुम्भ
ऊ ऐं श्रीं महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै गरूणवाहिन्यै श्रीं ऐं नम:।

मीन
ओं रं श्रीं धं धनदे रतिप्रिये स्वाहा।












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