महंगाई लेकर आयेगा विक्रम संवत् 2069

हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष 22 मार्च 2012 को रात 7.10 बजे विक्रम संवत् 2069 का प्रारंभ कन्या लग्न में होगा। इस वर्ष विश्वावसु नाम का संवत्सर रहेगा, जिसका स्वामी राहु है। विश्वावसु नामक संवत्सर 2069 की ग्रह परिषद कुछ इस प्रकार है- राजा- शुक्र। मन्त्री- शुक्र। धान्येश- शनि। मेघेश- गुरू। रसेश- मंगल। नीरसेश- सूर्य। फलेश- गुरू। धनेश- सूर्य। दुर्गेश- गुरू। सस्येश- चन्द्रमा।
समय का वास- इस वर्ष समय का वास कुम्हार के घर में है, इसलिए शासकों को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। राजनैतिक उथल-पुथल भी मची रहेगी।
विश्वावसु नाम के संवत्सर का फल-
विश्वा-वासौ-वसुमती-बहु-रोग--युक्ता।
शक्ताः जनाः नहि भवन्ति-च कार्य कर्तुम।।
वृष्यापि मध्यमतया-भवतीह-धान्यम।
स्यान्मध्यम-नृपवरेषुच नीतिवृत्तिः।।
विश्वावसु नामक संवत्सर में भूमि पर अधिक रोग फैलता है। मनुष्यों को अपने कार्य करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। वर्षा सामान्य होती है, अनाजों की उत्पत्ति भी मध्यम होती है। शासक नीतियों का प्रयोग उचित ढग से करते हैं।
सम्वत् 2069 का राजा तथा मंत्री दोनों ही शुक्र है। शुक्र का राजा होना देश की ढुलमुल दशा का परिचायक है। राजा के कानों और आंखों पर चापलूसी पर्दा पड़ा रहेगा। सभी तरह की अव्यवस्था तथा अस्थिरता का भाव देश में बना रहेगा। शुक्र के मंत्री होने से शासक को उचित सलाह मिलने के संकेत नजर आ रहे है। धन भाव में सूर्य अधिकार होने से व्यापारी वर्ग को अधिक द्रव्यलाभ होगा।
हर मौसम अपने चरम बिन्दु को छूने का प्रयास करेगा। गुरु के मेघेश होने से देश की पश्चिम दिशा में वर्षा अधिक हो सकती है। शासक वर्ग अपनी अन्तर कलह से व्यथित रहेंगे। रसेश मंगल स्वर्ण व चांदी के भाव तेज करायेगा। जल व मदिरा की उपलब्धि में कमी आयेगी। इस वर्ष नीरसेश सूर्य है, इसलिए तांबा, चन्दन, रत्न, माणिक्य, मोती आदि के मूल्यों में वृद्धि होगी।
देव गुरू बृहस्पति के फलनायक होने से भय नहीं रहता है। देव स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। शनि के धान्येश होने से, रोग का भय होवे एंव अधिकांश जनता से न्यायपूर्वक कर वसूली होती है। ब्राहम्ण, क्षत्रिय व वैश्य को विशेष सुख मिलने के आसार है। इस वर्ष मन्त्रिपरिषद को कई ग्रहों ने आपस में बांट रखा है। शनि के कारण चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य होंगे तथा अपराध को नियन्त्रण करने के लिए कठोर कानून भी बनेंगे।
मंगल के कारण युद्ध के सामानों के निमार्ण व आयात पर धन का अधिक व्यय होगा। ढुलमुल नीतियों के कारण मिली असफलता को पड़ोसी देशों का षड़यन्त्र बताया जायेगा। अनेक प्रकार की समस्याओं के बावजूद भी विश्वपटल पर भारत की साख में वृद्धि होगी।












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