Yogi Sarkar की 'संपदा' पहल ने 'अल्गोजा' को दी नई जिंदगी, UP से क्या है कनेक्शन?
Uttar Pradesh Sampada Programme: उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी 'संपदा' पहल के तहत ब्रज लोक संगीत की एक प्राचीन परंपरा 'अल्गोजा' का दस्तावेजीकरण किया गया है। यह वाद्य यंत्र धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुका था। राज्य सरकार के इस प्रयास को लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक सार्थक कदम माना जा रहा है।
11 मई, सोमवार को उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान तथा उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में लखनऊ के गोमती नगर स्थित अकादमी स्टूडियो में यह विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। मथुरा के प्रसिद्ध लोक कलाकार सुखवीर और हरप्रसाद ने अल्गोजा एवं चंग वादन की पारंपरिक शैलियों का जीवंत प्रदर्शन किया, जिसने दर्शकों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया।

What Is Algoza: अल्गोजा क्या है?
अल्गोजा एक पारंपरिक सुषिर वाद्य यंत्र है, जिसमें दो लकड़ी की बांसुरियों को साथ-साथ बजाया जाता है। इसकी लयबद्ध और मधुर ध्वनि ब्रज, राजस्थान और पंजाब की चरवाहा लोक परंपराओं में सदियों से गूंजती रही है। यह मुख्य रूप से लोक गीतों, भक्ति रस और मौखिक परंपराओं को जीवंत रखने का माध्यम रहा है। हालांकि, आधुनिकता की चपेट में आने और नए वाद्य यंत्रों के प्रचलन के कारण पारंपरिक अल्गोजा वादकों की संख्या तेजी से घट रही थी।
'संपदा' कार्यक्रम: लोक विरासत का संरक्षण
उत्तर प्रदेश सरकार की 'संपदा' योजना का मुख्य उद्देश्य ठीक इन्हीं विलुप्तप्राय लोक कलाओं, वाद्य यंत्रों और संगीत परंपराओं को बचाना तथा उन्हें डिजिटल रूप में संरक्षित करना है। कार्यक्रम में लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी ने बताया कि ब्रज क्षेत्र की संगीत विरासत को सहेजने के लिए यह दस्तावेज़ीकरण बेहद जरूरी था।
संगीत नाटक अकादमी के निदेशक डॉ. शोभित नाहर ने कलाकारों के साथ विशेष संवाद सत्र में अल्गोजा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसके तकनीकी पहलुओं, वर्तमान चुनौतियों और युवा पीढ़ी तक इसे पहुंचाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की।
राजनीतिक-सांस्कृतिक महत्व
उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार का फोकस पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ा है। 'संपदा' कार्यक्रम इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसमें लोक कलाकारों को मंच, प्रशिक्षण और आर्थिक प्रोत्साहन देने के साथ-साथ उनकी कला का डिजिटल आर्काइव तैयार किया जा रहा है।
ब्रज क्षेत्र उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है। कृष्ण भक्ति, रासलीला और लोक गीतों की परंपरा यहां सदियों पुरानी है। अल्गोजा जैसे यंत्रों का दस्तावेज़ीकरण न केवल सांस्कृतिक विरासत को बचाता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देता है। लोक कलाकारों को मुख्यधारा से जोड़ने से पर्यटन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और युवा उद्यमिता को भी बढ़ावा मिलेगा।
चुनौतियां और भविष्य की राह
अल्गोजा वादन की सबसे बड़ी चुनौती नई पीढ़ी में रुचि की कमी है। आधुनिक संगीत और डिजिटल मनोरंजन के दौर में युवा पारंपरिक वाद्यों की ओर कम आकर्षित हो रहे हैं। 'संपदा' कार्यक्रम के जरिए सरकार इन्हीं चुनौतियों से निपटने का प्रयास कर रही है- कार्यशालाओं, प्रशिक्षण शिविरों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
कार्यक्रम में शामिल कला प्रेमियों और शोधकर्ताओं ने इसे सराहा। उन्होंने कहा कि ऐसी पहलें लोक संस्कृति को सिर्फ संग्रहालयों तक सीमित नहीं रहने देतीं, बल्कि उन्हें जीवंत बनाए रखती हैं।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा
उत्तर प्रदेश सरकार का यह कदम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और लोक धरोहर संरक्षण की बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। गंगा-यमुना संस्कृति, ब्रज, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल की विविध लोक परंपराओं को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास चल रहा है। अल्गोजा जैसे दुर्लभ वाद्यों का दस्तावेज़ीकरण इसी दिशा में एक ठोस कदम है।
'संपदा' कार्यक्रम के तहत अल्गोजा लोक संगीत परंपरा का दस्तावेज़ीकरण उत्तर प्रदेश में लोक कलाओं के पुनरुत्थान की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। मथुरा के कलाकार सुखवीर और हरप्रसाद की प्रस्तुतियों ने साबित किया कि ये धुनें अभी भी जीवित हैं, बस उन्हें सही मंच और समर्थन की जरूरत है।
सरकार की यह मुहिम न केवल विलुप्त होती विरासत को बचाएगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ेगी। ब्रज की अल्गोजा धुनें फिर से गूंजें, यही 'संपदा' का असली मकसद है।
(इनपुट PTI)













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