2026 Assembly Elections: असम-बंगाल राज्य चुनावों में SIR-परिसीमन ने BJP को सत्ता मजबूत करने में कैसे मदद की?

2026 Assembly Elections: 2026 के विधानसभा चुनावों ने भारतीय राजनीति के कई स्थापित समीकरणों को बदल दिया। असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु में मतदाताओं ने फैसले किए, जिनमें BJP के प्रदर्शन ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। असम में लगातार तीसरी बार सत्ता बरकरार रखते हुए BJP ने भारी बहुमत हासिल किया, जबकि पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद TMC के शासन को समाप्त कर BJP ने जबरदस्त वापसी की।

ये नतीजे केवल सत्ता-विरोधी लहर, कल्याणकारी योजनाओं से थकान, शहरी युवाओं के विद्रोह या सामाजिक समीकरणों के बदलाव का नतीजा नहीं थे। दो महत्वपूर्ण संस्थागत प्रक्रियाओं 'असम में परिसीमन (Delimitation) और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR)' ने शांत लेकिन शक्तिशाली भूमिका निभाई। इन प्रक्रियाओं ने चुनावी भूगोल, मतदाता संरचना और राजनीतिक माहौल को इस कदर प्रभावित किया कि BJP का वर्चस्व और मजबूत हो गया।

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ये प्रक्रियाएं रातोंरात जीत नहीं दिला सकती थीं। BJP ने सालों की जमीनी मेहनत, संगठनात्मक विस्तार और लक्षित प्रचार से आधार तैयार किया था। लेकिन परिसीमन और SIR ने प्रतिनिधित्व के गणित को बदला, ध्रुवीकरण को गहरा किया और बहुसंख्यक वोटों को अधिक प्रभावी सीटों में तब्दील करने में मदद की। आइए विस्तार से समझते हैं...

Assam Assembly Elections 2026: परिसीमन - जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को चुनावी लाभ में बदलना

असम 2026 चुनावों में परिसीमन का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 2023 में हुए परिसीमन ने राज्य की 126 विधानसभा सीटों की सीमाओं को पूरी तरह नया रूप दिया। नतीजा 2026 में साफ दिखा कि BJP के नेतृत्व वाले NDA ने लगभग 102 सीटें हासिल कीं। NDA का कुल वोट शेयर 48% के करीब पहुंचा, जबकि BJP अकेले जिन सीटों पर लड़ी, वहां उसका वोट शेयर 54-55% से ऊपर रहा। इससे बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट और AGP जैसे सहयोगियों पर उसकी निर्भरता कम हो गई। परिसीमन से पहले और बाद की तुलना इस बदलाव को स्पष्ट करती है।

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2021 में कांग्रेस और NDA द्वारा जीती गई सीटों में मतदाताओं की औसत संख्या लगभग समान थी (करीब 1.84 लाख)। 2026 में कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में यह संख्या बढ़कर औसतन 2.5 लाख (कई सीटों पर 3 लाख से ज्यादा) हो गई, जबकि BJP-झुकाव वाली सीटों में यह घटकर 1.6 लाख के आसपास रह गई।

विश्लेषकों ने इसे 'पैकिंग और क्रैकिंग' की क्लासिक रणनीति बताया। मुस्लिम-बहुल आबादी को कम संख्या वाली लेकिन बड़ी-बड़ी सीटों में समेट दिया गया, जबकि आसपास की सीटें हिंदू-बहुल बन गईं। नतीजतन, विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 30-31 से घटकर 21-22 रह गई।

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निचले असम और बराक घाटी जैसे क्षेत्रों में जहां कांग्रेस + AIUDF का प्रभाव पहले मजबूत था, अब वह कमजोर पड़ गया। ऊपरी असम और हिंदू-बहुल इलाके BJP के लिए और अधिक सुरक्षित हो गए। इससे 'जनगणना चुनाव' की गतिशीलता मजबूत हुई, जहां जनसांख्यिकीय बहुमत नतीजों का बड़ा हिस्सा तय कर देता है।

परिसीमन ने BJP का समर्थन पैदा नहीं किया। पार्टी 2016 और 2021 में भी बढ़ते वोट शेयर के साथ आगे बढ़ रही थी। महिला मतदाताओं का समर्थन और 'डबल इंजन' सरकार का संदेश पहले से काम कर रहा था। लेकिन सीमाओं के नए निर्धारण ने हिंदू वोटों के बढ़ते एकीकरण को सीटों में बेहतर तरीके से तब्दील किया। कांग्रेस का वोट शेयर लगभग बरकरार रहा, लेकिन सीटें भारी गिरावट आईं क्योंकि बचे हुए इलाकों में हार का अंतर बढ़ गया।

आलोचक इसे 'जेरीमैंडरिंग' कहते हैं कि चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी। समर्थक इसे ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने और मूल असमिया और हिंदू-बहुल क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व देने का कदम मानते हैं। नतीजा यह कि भारत के सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में से एक में अब 75% निर्वाचन क्षेत्र स्पष्ट रूप से हिंदू या मुस्लिम-बहुल जिलों में आते हैं। इससे BJP के दीर्घकालिक वर्चस्व को मजबूती मिली।

West Bengal Assembly Elections 2026: SIR - ध्रुवीकरण और सुरक्षा कवच का निर्माण

पश्चिम बंगाल में मुख्य चर्चा Special Intensive Revision (SIR) मतदाता सूची संशोधन को लेकर रही। विभिन्न क्षेत्रों में नाम हटाए गए, लेकिन इसका प्रभाव केवल संख्यात्मक नहीं था। BJP ने 77 से 206 सीटें जीतीं, वोट शेयर 39% से बढ़कर 46% हो गया, जबकि TMC 81 सीटों और 41% वोट शेयर पर सिमट गई। SIR के तहत नाम हटाने का सीधा प्रभाव 49 सीटों पर देखा गया, जिनमें BJP ने 26 जीतीं।

SIR की असली ताकत यांत्रिक नाम हटाने में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा करने में थी। हिंदू-बहुल इलाकों में इसे 'घुसपैठियों' (खासकर बांग्लादेशी मूल के) की पहचान का जरिया माना गया। मतदाताओं ने इसकी कमियों को स्वीकार किया क्योंकि इससे अवैध आप्रवासन की पुरानी चिंताएं संबोधित हुईं।

मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में इससे भय का माहौल बना। मताधिकार छिनने, परिवार बिखरने और शिक्षा से वंचित होने का डर साफ नजर आया। इस विषम अनुभव ने बिना किसी बड़े सांप्रदायिक हिंसा के ही विभाजन को गहरा कर दिया।

SIR व्यापक संस्थागत प्रयास का हिस्सा था। 200 से ज्यादा कंपनियां अर्धसैनिक बलों की, नौकरशाही में बदलाव और चुनाव आयोग की सक्रिय भूमिका। TMC के कथित राजनीतिक हिंसा और कैडर प्रभुत्व से तंग आ चुके तटस्थ मतदाताओं के लिए यह 'सुरक्षा कवच' बन गया। 15 साल की TMC सरकार में 'पार्टी समाज' मॉडल (पार्टी, सरकार, क्लब, सिंडिकेट और बाहुबलियों का गठजोड़) ने लोगों में थकान पैदा कर दी थी। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं पहुंचीं, लेकिन स्थानीय हस्तक्षेप, कटौती और विकास की कमी ने नाराजगी बढ़ाई।

BJP को केवल 5-7% अतिरिक्त वोट स्विंग की जरूरत थी। ग्रेटर कोलकाता के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्र, जो पहले प्रतिरोधी थे, अब BJP के पक्ष में झुक गए। हिंदू एकजुटता बढ़ी और मुस्लिम वोट विखंडित हुआ। सांस्कृतिक संकेत जैसे अप्रत्याशित जगहों पर हनुमान चालीसा का प्रदर्शन इस बदलाव को दर्शाते हैं।

दोनों प्रक्रियाओं का तालमेल और अन्य कारक

परिसीमन और SIR ने स्वाभाविक सामाजिक बदलावों के साथ मिलकर काम किया। कल्याणकारी योजनाएं अब आधारभूत मानक बन चुकी हैं। व्यक्तित्व पूजा, पारिवारिक राजनीति और स्थानीय गुंडागर्दी ने सत्ता-विरोधी भावना को बढ़ावा दिया। तमिलनाडु में युवाओं द्वारा TVK जैसे नए विकल्प को अपनाना और केरल में सत्ता हस्तांतरण की पुरानी व्यवस्था का लौटना दर्शाता है कि ध्रुवीकरण के अलावा अन्य रुझान भी सक्रिय हैं।

BJP की संगठनात्मक मशीनरी 'बूथ स्तर का कार्य, लक्षित प्रचार और रणनीतिक मानचित्रण' ने इन संस्थागत अवसरों का पूरा फायदा उठाया। असम में जीत को और मजबूत किया, बंगाल में शहरी पैठ बनाई।

देश पर पड़ने वाला असर

2026 के चुनाव क्षेत्रीय दलों और वामपंथियों के प्रभाव में कमी का संकेत देते हैं। दक्षिण भारत में प्रतिनिधित्व की बहस, भविष्य के परिसीमन और संघवाद पर सवाल उठ रहे हैं। BJP की संस्थागत समझ, पहचान-आधारित एकीकरण और शासन वितरण की क्षमता विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है। गैर-BJP दलों को बहुसंख्यकवादी लहर के बीच धर्मनिरपेक्षता और वैकल्पिक विजन को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। सत्ता-विरोधी भावना अभी प्रबल है, लेकिन इसे सूक्ष्म स्थानीय मुद्दों के समाधान से जोड़ना जरूरी है।

2026 का फैसला केवल परिसीमन या SIR के बारे में नहीं था। यह संचित थकान, रणनीतिक धैर्य और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं का प्रतिबिंब था। फिर भी इन प्रक्रियाओं ने असम में स्वच्छ बहुमत और बंगाल में ध्रुवीकृत लेकिन सुरक्षित माहौल का आधार दिया।

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