10वीं तक पढ़ी महिला ने 80 % घटाई खेती की लागत, धान की 63 किस्मों का किया विकास
धान की 63 किस्में विकसित करने वालीं महिला सरोजा पाटिल की उद्यमिता (entrepreneur saroja patil) मिसाल है। जैविक खेती कर लोकप्रिय उत्पाद तैयार करने वालीं सरोजा 50 हजार रुपये महीना कमाती हैं।
दावणगेरे, 20 जून : कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जज्बा और जुनून हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं। कर्नाटक की एक महिला ने एकेडमिक ज्ञान की कमी को कभी अपने रास्ते का कांटा नहीं बनने दिया। 63 वर्षीय इस महिला ने अब तक धान की 63 किस्में विकसित की हैं। जैविक खेती की हिमायती ये महिला सरोजा पाटिल हैं। इन्होंने ऑर्गेनिक फसलों के अलावा उत्पादों का मार्केट भी तैयार किया है। आलम ये है कि इनके पास इस्कॉन (ISKCON) जैसी संस्था का ऑर्डर भी आता है। बाजरे और दूसरे मिलेट्स (मोटे अनाज) की भी जैविक खेती करने वालीं सरोज अपने गांव के अलावा 20 गांवों के लोगों को प्रशिक्षण भी देती हैं। जानिए प्रेरक कहानी


कई उत्पादों की फूड प्रोसेसिंग
सरोजा एन पाटिल कर्नाटक के दावणगेरे जिले के नित्तूर गांव की रहने वाली हैं। किसान परिवार में जन्म होने के कारण खेती से बचपन से ही जुड़ाव रहा। कम उम्र से ही सरोज कृषि गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल हो गईं। परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए सरोज अब मार्केट डिमांड के मुताबिक ऑर्गेनिक तरीके से उपजाई गई फसलों की प्रोसेसिंग भी करती हैं। केंद्र सरकार की स्कीम PMFME स्कीम के तहत बनी इनकी संस्था- तधवनम में सब्जियों के अलावा चावल, रागी, सुपारी, नारियल और बाजरे की खेती के बाद फूड प्रोसेसिंग होती है।

देसी धान की किस्मों का बीज संरक्षण
सरोजा के काम में उनके पति नागेंद्रप्पा एस पाटिल भी मदद करते हैं। दोनों की शादी करीब 43 साल पहले हुई थी। सरोज बताती हैं कि 10वीं कक्षा के बाद वे स्कूल नहीं जा सकीं। खेती-किसानी से लगाव के कारण उन्होंने कृषि निदेशालय के संयुक्त निदेशक के मार्गदर्शन में धान उत्पादन की एसआरआई तकनीक (SRI technique rice cultivation) सीखी। तकनीक सीखने के साथ-साथ उन्होंने देसी धान की किस्मों का बीज संरक्षण भी किया।

खेती के खर्च में 80% तक गिरावट
'सीखने की कोई उम्र सीमा नहीं होती।' इस सिद्धांत पर सरोजा को दृढ़ विश्वास है। उन्होंने खेती की अलग-अलग तकनीक सीखी और जैविक खेती के क्षेत्र में रम गईं। इसका ऐसा असर हुआ कि सरोजा कि खेत की मिट्टी उपजाऊ बनी रही। प्रति एकड़ कृषि उपज में 400 किग्रा का इजाफा हुआ। श्रम और बीज लागत में कटौती होने के कारण खेती में होने वाले खर्च में लगभग 80% तक गिरावट आई।

महिलाओं को एकजुट कर मिली कामयाबी
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तधवनम में सरोजा सहित डेढ़ दर्जन से अधिक (लगभग 20) महिलाएं काम करती हैं। सरोजा की संस्था के उत्पादों की डिमांड दक्षिण कर्नाटक, बेंगलुरु, चेन्नई के अलावा तेलंगाना में भी है। हाल ही में, उन्होंने हैदराबाद में सप्लाई शुरू की है। उत्पादों के वितरण और मार्केटिंग में सहज समृद्धि एफपीओ (Sahaja Samrudha FPO) से मदद मिलती है।

बाजरे की प्रोसेसिंग में 20 वर्षों की मेहनत
बाजरा प्रसंस्करण में 20 से अधिक वर्षों तक समर्पित रहने वालीं सरोजा बताती हैं कि बाजरा की व्यावसायिक खपत में उन्हें अच्छी संभावनाएं दिखीं। बकौल सरोजा, उन्होंने अब तक धान की 63 किस्मों को विकसित किया है। इसके अलावा बाजरे से बने उत्पादों को खाने के हेल्दी विकल्प के रूप में विकसित किया जा सकता है। माल्ट पाउडर, अनाज और आरटीसी मिक्स जैसे बाजरा-आधारित उत्पादों की प्रोसेसिंग करने के लिए सरोजा ने 2014 में कर्नाटक के दावणगेरे में अपना उद्यम- तधवनम (Tadhvanam) स्थापित किया। उनके काम की जानकारी मिलने पर पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी भी सरोजा से मिलने पहुंचीं थीं।

सरकार से पैसे मिले, कई मशीनें खरीदीं
वित्तीय और तकनीकी सहायता कृषि विभाग के माध्यम से पीएम फॉर्मलाइजेशन ऑफ माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज (PMFME) योजना के तहत मिली। एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) के तहत दावणगेरे जिले से बाजरा चुना गया। PMFME के तहत बैंक लोन मिला। पैसे मिलने के बाद सरोजा ने आटा चक्की, एक पल्वराइज़र, एक बैंड सीलर, एक पैकेजिंग मशीन और एक ड्रायर मशीन खरीदी।

मशीनों से मिली मदद
सरोजा बताती हैं कति बाजरे की प्रोसेसिंग का पहला चरण फसल का सूखना है। इस काम में ड्रायर मशीन से मदद मिलती है। दूसरे चरण में सूखे बाजरा से अच्छी गुणवत्ता का पाउडर तैयार होता है। इसमें आटा चक्की और पल्वराइज़र से मदद मिलती है। बाद में आटे से माल्ट पाउडर, अनाज और आरटीसी मिक्स जैसे बाजरा आधारित उत्पाद तैयार होते हैं। प्रोसेस्ड बाजरा उत्पादों को अलग-अलग साइज में पैक करने में बैंड सीलर और पैकेजिंग मशीन से मदद ली जाती है।

'खेत से परिवार तक उत्पाद' का मंत्र, मिले पुरस्कार
सरोजा का आत्मनिर्भर उद्यम- तधवनम 'खेत से परिवार तक उत्पाद' के मंत्र पर काम करता है। PMFME योजना से मिली मदद के बाद अब तधवनम वैश्विक ब्रांड बनने की कल्पना भी करता है। सरोजा सामाजिक दायित्व भी पूरे कर रही हैं। आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और उनके आवास जैसे उद्देश्यों के लिए भी वे बेहिचक पैसे खर्च करती हैं। 63 किस्मों की धान विकसित करने के लिए सरोजा को 2013 में 'महिंद्रा समृद्धि' पुरस्कार और 2008-09 में कृषि विभाग की ओर से 'कृषि पंडित' पुरस्कार दिए गए।

इन उत्पादों को लेकर पॉपुलर हैं सरोजा
तधवनम नाम के फर्म का रजिस्ट्रेशन कराने के बाद सरोजा के केले का आटा, रागी, चावल, ज्वार और पर्ल मिलेट्स पापड़ सहित कई उत्पादों की काफी डिमांड देखी गई। इनके चावल-गेहूं, सेंवई, रागी समेत कई अन्य उत्पादों को भी यूनिक माना जाता है। सरोजा के तधवनम से प्रोसेस्ड- रवा इडली मिक्स, नवने बीसी बेले बाथ मिक्स (Navane Bisi bele bath mix), रागी मालदी और मसाले, गुड़ और देशी जड़ी-बूटियों को मिलाकर बना रागी पाउडर मिक्स भी काफी लोकप्रिय है। इसके अलावा कई तरह के फ्लेवर की चटनी भी बेची जाती है। सरोजा ने ईश्वर थीर्टा (Eshwar Theerta) नाम की एक जैविक खाद्य निर्माता से वस्तुओं की पैकेजिंग सीखी। ईश्वर बताती हैं कि ट्रेनिंग में सिखाई गई चीजों से सरोजा काफी आगे निकल चुकी हैं। उन्हें सरोजा की उपलब्धियों पर नाज है।

इस्कॉन से मिला ऑर्डर, बड़े शहरों में भी डिमांड
सरोजा के तधवनम में तैयार हुए जैविक उत्पाद कर्नाटक के अलावा मुंबई, अहमदाबाद, नई दिल्ली, चेन्नई और जैसे शहरों में भी लोकप्रिय हुए। सरोजा बताती हैं कि अपने उत्पादों पर अधिक विश्वास तब हुआ जब इस्कॉन ने चावल पापड़ का ऑर्डर दिया। उन्होंने बताया कि इस्कॉन ने उनसे संपर्क कर बताया कि उत्पाद उनके मानकों पर खरा उतरता है और विनिर्देशों को भी पूरा करता है। इस पर उन्हें खुद पर गर्व हुआ।

केले का आटा, लजीज लड्डू और भी बहुत कुछ
सरोजा के केले का आटा भी काफी सफल उत्पाद है। इसे तैयार करने कि विधि के बारे में वे बताती हैं कि केले को सुखाकर पाउडर में बदला जाता है। केले का आटा मैदा या अन्य प्रकार के आटे का एक अच्छा विकल्प है। कस्टमर रिव्यू के बारे में सरोजा बताती हैं कि दैनिक उपयोग में केले का आटा सामान्य नहीं था ऐसे में इसकी डिमांड कई लोगों ने बड़े पैमाने पर की। ग्राहकों को तधवनम की ओर से पेश किए गए 15 स्वस्थ भोजन भी काफी रास आए। मेन्यू में केक और मसालेदार व्यंजन जैसे ठकली (टमाटर चावल) को शामिल किया गया था। तधवनम ड्राई फ्रूट्स की प्रोसेसिंग से लड्डू भी बनाती है।

महिलाओं की ड्यूटी और मासिक कमाई
सरोजा तधवनम उद्यम की मदद से 50,000 रुपये प्रति माह कमाती हैं। अपनी उपलब्धियों से प्रसन्न सरोजा का कहना है कि उन्होंने 20 महिलाओं को काम पर रखा है। महिलाएं अपने शेड्यूल के अनुरूप अंशकालिक (part time) काम करती हैं। जैविक खेती और उत्पाद के बारे में सरोजा कहती हैं कि केमिकल युक्त होने के कारण बाजार में कई वस्तुएं दूषित हैं। ऐसे में वे चाहती हैं कि जैविक खेती अपनाई जाए। लोगों को हेल्दी भोजन के लिए जैविक बागवानी करनी चाहिए। सब्जियों की खेती खुद करनी चाहिए।
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