Paddy Farming : किसान DSR तकनीक से कमा सकते हैं मोटा मुनाफा, कम पानी में होगी धान की फसल
धान की खेती (paddy farming) करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। डीएसआर तकनीक (direct seeding of rice- DSR) की मदद से कम मेहनत में ज्यादा उपज हासिल की जा सकती है।
नई दिल्ली, 24 मई : डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस यानी डीएसआर तकनीक से धान की खेती में धान के बीजों को सीधे मिट्टी में मशीन की मदद से डाला जाता है। मशीन धान की बुआई और खरपतवारनाशक (herbicide) का छिड़काव एक साथ करती है। धान की सीधी बुआई (DSR) और पारंपरिक रोपाई विधि से धान की खेती में बुनियादी अंतर ये है कि परंपरागत पद्धति में, किसानों को पहले नर्सरी में धान के पौधों को उगाना पड़ता है। इसके बाद पानी से भरे खेत में धान के पौधों की रोपाई होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि डीएसआर विधि से धान की खेती में पानी और पैसे दोनों कम खर्च होते हैं। ऐसे में लगातार गिर रहे भूगर्भ जलस्तर को बरकरार रखना चैलेंजिंग है। इस आर्टिकल में सीखें, कम पानी में धान की खेती का तरीका- डीएसआर

धान की खेती में DSR हर मायने में किफायती
धान की खेती और डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस यानी डीएसआर तकनीक से जुड़ी स्टडी के मुताबिक परंपरागत धान की खेती के दौरान एक किलो उत्पादन करने के लिए लगभग 5,000 लीटर पानी की जरूरत होती है। दूसरी ओर डीएसआर तकनीक से धान की खेती करने पर श्रमिकों की संख्या कम होने के अलावा 25 प्रतिशत बिजली की लागत भी बचती है। इसके अलावा पूरी फसल के दौरान 20 प्रतिशत तक पानी बचाने में भी मदद मिलती है। जानिए डीएसआर के कुछ प्रमुख फायदे
- ट्रैक्टर से चलने वाली मशीनों की मदद से बीजों की बुआई
- पर्यावरण हितैषी तकनीक
- पानी की बचत
- कम मजदूरों की जरूरत
- मिट्टी की सेहत में सुधार, उपजाऊ बनती है जमीन

DSR से लगभग हर मिट्टी में धान की फसल
पंजाब और हरियाणा की सरकारें किसानों को डीएसआर तकनीक से धान उगाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, डीएसआर के माध्यम से बासमती चावल भी उगाया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र में धान की वेराइटी पर शोध करने वाले जानकारों के मुताबिक गैर-पोखर परिस्थितियों (non-puddle conditions) में भी बासमती की खेती की जा सकती है। इसका मतलब धान की बुआई के पहले खेतों में पानी भरे रखना जरूरी नहीं। डीएसआर तकनीक से धान लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में उगाए जा सकते हैं।

DSR में धान की रोपाई के दो तरीके
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और पंजाब के सीएम भगवंत मान ने डीएसआर तकनीक से धान की खेती पर जोर दिया है। दोनों राज्यों की सरकारों ने कहा है कि डीएसआर विधि से धान की खेती में किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन और सहायता दी जाएगी। डीएसआर विधि से धान की खेती में नर्सरी तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ती। परंपरागत रोपाई विधि में एक किलो धान पैदा करने में तीन से पांच हजार लीटर पानी का इस्तेमाल होता है।
दो तरीकों से रोपाई
दूसरी ओर सीधी बिजाई या डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस तकनीक में दो तरीकों से धान की बुआई होती है। पहले तरीके में बुवाई के लिए देसी हल और दूसरे में मशीन से रोपाई की जा सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक फसल के अवशेषों को जलाने के बदले, अवशेषों को मिट्टी में मिलाने से धरती और उपजाऊ बनती है।

खरपतवार से निजात पाने के उपाय
रोपाई विधि की तुलना में सीधी बिजाई में खरपतवार ज्यादा होता है। रोपाई में पानी होने के कारण खरपतवार नहीं होता। खरपतवार से निजात पाने के लिए बुवाई के 20-25 दिन के बाद खुरपी से निराई-गुड़ाई करें। दूसरी निराई-गुड़ाई बुआई से 40-45 दिनों के बाद करनी होती है।
केमिकल के छिड़काव से हटाएं खरपतवार
श्रमिकों की कमी के कारण कम लागत और श्रम में खरपतवार हटाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल कर सकते हैं। पेंडीमैथलीन का इश्तेमाल एक हेक्टेयर में एक किलो 600 से 800 लीटर पानी में मिलाने के बाद 2-3 दिनों के भीतर खेतों में छिड़काव करें। खेत में नमी बनी रहे, इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

सही बीज का चुनाव करें, जानिए धान के प्रकार
धान की खेती या किसी भी फसल को बोने के समय सही बीज का चुनाव सबसे अहम है। धान की सीधी बिजाई यानी DSR में भी धान की किस्म का चुनाव क्षेत्र के मुताबिक करना चाहिए। वैज्ञानिकों ने धान के कई प्रकार सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं-
| पीआरएस 10 | पूसा बासमती 1509 |
| पूसा 1612 | एरिज 6444 |
| एचकेआई 126 | पूसा 44 |
| पीएचबी 71 | एरिज 6129 |
| नरेंद्र 57, 118 और 359 | राजेंद्र धान 201 |
| पूसा सुगंध 5 | एमएएस 946-1 |
इनके अलावा धान की और भी किस्म हैं। धान की बुआई के पहले गहरी जुताई जरूरी है। इसके बाद 2-3 बार कल्टीवेटर से जुताई करें। फिर पाटा लगाकर खेत को समतल करना जरूरी है।

कीटनाशकों का इस्तेमाल
किसान भाई उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के बाद ही करें। DSR से धान की बुआई के बाद 150-160 किलो नाइट्रोजन, 60-80 किलो फास्फोरस और पोटाश और 25 किलो जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए।
एक हेक्टेयर में 30-35 किलो बीज
वैज्ञानिकों के मुताबिक पलेवा करने से धान का अंकुरण अच्छा होता है। DSR तकनीक के तहत धान बुआई के लिए देसी हल या मशीन का भी उपयोग किया जा सकता है। बीज के साइज के हिसाब से मात्रा तय होती है। औसतन एक हेक्टेयर में 30-35 किलो बीज लगते हैं। बुआई के दौरान एक कतार से दूसरे कतार के धान की दूरी 20-25 सेंटीमीटर होनी चाहिए। धान को 2-3 सेमी गहराई में बोना चाहिए।
ये भी पढ़ें- पंजाब में धान की खेती, DSR तकनीक अपनाने पर किसानों के लिए 450 करोड़ का प्रावधान
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