भीषण गर्मी में 'झुलसा गेहूं', मौसम की मार के कारण 20 साल में सबसे कम उत्पादन
भारत में इस साल 20 साल में सबसे कम गेहूं उत्पादन (India wheat at 20 year low) हुआ है। भीषण गर्मी में 'झुलसी गेहूं की फसल' इस बार जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़ गए। पढ़िए रिपोर्ट
नई दिल्ली, 21 जून : भारत में गेहूं उत्पादन (India wheat production) का आधिकारिक आंकड़ा जारी हो गया है। इन आंकड़ों के मुताबिक भारत में 20 साल में सबसे कम गेहूं उत्पादन हुआ है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक गेहूं उत्पादन होता है, लेकिन भीषण गर्मी के बीच इन राज्यों में जलवायु संकट देखा गया। चिलचिलाती गर्मी में 'गेहूं की फसल झुलसती' दिखी, और यही कारण रहा कि गेहूं की उत्पादकता में दो दशकों में सबसे अधिक गिरावट आई है।

धूप के कारण भूरे रंग की हुई फसल
मौसम विभाग के मुताबिक मार्च में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के मानसा जिले के गेहूं किसान गुरबख्श नागी के खेत में पकने वाले गेहूं के डंठल सुनहरे पीले रंग के बाद भूरे रंग में बदल गए। ये फसल खराब होने यानी भीषण गर्मी में फसलों और दानों के सिकुड़ने का संकेत था।

2010 से भी बड़ा नुकसान
फसल की कटाई के बाद जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में चिलचिलाती गर्मी के कारण गेहूं की उत्पादकता में दो दशकों में सबसे अधिक गिरावट देखी गई। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल के नुकसान साल 2010 और 2019 से भी बड़ा है। 2010 में भी 2022 की तरह हीटवेव देखी गई थी। 2019 में इस साल की तुलना में थोड़ी कम गर्मी थी, लेकिन इसके बावजूद गेहूं की फसल प्रभावित हुई थी। जानकारों के मुताबिक गेहूं जैसी मुख्य फसल पर मौसम का खतरनाक प्रभाव भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर जोखिमों का संकेत देते हैं।

गेहूं किसान कर्ज के दलदल में !
पंजाब में गेहूं की पैदावार 43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह गई है। औसतन, पैदावार में प्रति हेक्टेयर 20% की गिरावट आई, जो 2010 में 8% की गिरावट से तेज थी। किसानों का कहना है कि उन्हें ₹12,000- ₹18000 प्रति क्विंटल (100 किलोग्राम) का नुकसान हुआ है। गेहूं की फसल बर्बाद होने के कारण किसान कर्ज के दलदल में फंसते दिख रहे हैं।

कृषि मंत्रालय ने घटाया उत्पादन पूर्वानुमान
उत्तर प्रदेश भी पंजाब की तरह बड़ा गेहूं उत्पादक राज्य है। यूपी में गेहूं की पैदावार में 18% की गिरावट आई। हरियाणा में गेहूं 19% कम पैदा हुआ। तीन प्रमुख राज्यों में गेहूं उत्पादन में गिरावट के कारण कृषि मंत्रालय ने शुरुआती उत्पादन पूर्वानुमान 111.32 मिलियन टन से 5% घटाकर 106.41 मिलियन कर दिया है। वास्तविक संख्या इससे और भी कम हो सकती है। आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब में, बठिंडा और मानसा में गेहूं उत्पादन में सबसे अधिक 30% तक गिरावट देखी गई है।

गेहूं की कम पैदावार का दूरगामी असर
गेहूं की पैदावार के संबंध में जो आंकड़े सामने आए हैं, वो वैज्ञानिकों ने क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट (crop-cutting experiments) के आधार पर जारी किए हैं। इस पद्धति से वैज्ञानिकों को पैदावार निर्धारित करने में मदद मिलती है। इसी पद्धति से फसल के नुकसान का भी आकलन होता है। 20 साल में गेहूं की कम पैदावार के संबंध में वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके दीर्घकालिक असर देखे जा सकते हैं। गेहूं उत्पादन के लिए मशहूर इलाके भौगोलिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक देश में जलवायु पूर्वानुमानों से पता चलता है कि जल्द ही अगर कोई उपाय नहीं किए गए तो गर्मी और बढ़ेगी।

अत्यधिक गर्मी जलवायु परिवर्तन का संकेतक
एचटी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल, चार इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की पहली रिपोर्ट में बदलते मानसून, बढ़ते समुद्र, घातक हीटवेव, तीव्र तूफान, बाढ़ और हिमनदों के पिघलने की सबूतों पर इशारा किया जा चुका है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के जलवायु परिवर्तन और कृषि मौसम विज्ञान विभाग की पवनीत कौर किंगरा के अनुसार, मार्च और अप्रैल में उत्तर पश्चिम भारत में अत्यधिक गर्मी जलवायु परिवर्तन का एक संकेतक थी। दो महीने पहले औसत अधिकतम तापमान सामान्य से लगभग 4 डिग्री सेल्सियस अधिक था।

किसान को 6 लाख रुपये का नुकसान
जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि कार्यों में जोखिम अधिक है। गेहूं की फसल खराब होने पर एचटी की रिपोर्ट में बठिंडा के भारतीय किसान यूनियन के सदस्य रमिंदर सिंह उप्पल ने बताया उनकी सामान्य फसल का केवल आधा ही 'बिक्री योग्य गुणवत्ता' का निकला। मुझे 6 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। भीषण गर्मी के कारण मेरी एक भैंस मर गई। डिहाइड्रेशन के कारण तीन मवेशियों की तबीयत गंभीर रूप से खराब हो गई। उन्होंने कहा, ऐसा गर्म मौसम कभी नहीं देखा।

गेहूं की पैदावार में 52 % गिरावट की आशंका
बता दें कि भारत की कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर 2016 में सरकारी रिपोर्ट जारी हुई थी। इसमें अनुमान लगाया गया था कि 2.5 से 4.9 डिग्री सेल्सियस तापमान की वृद्धि के कारण गेहूं की पैदावार को 41% -52% तक कम हो सकती है। हालिया रिसर्च में पता चलता है कि भारतीय-गंगा के मैदान (Indo-Gangetic Plain; IGP) दुनिया का प्रमुख गेहूं-उत्पादन क्षेत्रों में से एक है। इन इलाकों में भी बढ़ती गर्मी का असर दिखेगा। जून 2021 में यूरोपीय देश नॉर्वे के ओस्लो में सेंटर फॉर इंटरनेशनल क्लाइमेट रिसर्च में पदस्थापित एएस दलोज के नेतृत्व में जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर एंड फूड रिसर्च में क्लाइमेट चेंज पर रिसर्च रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसमें भारतीय-गंगा के मैदान में जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों को दिखाया गया है।

गेहूं उत्पादन 109 मिलियन टन
खराब मौसम के प्रत्यक्ष प्रभाव के कारण गेहूं की पैदावार में -1 % और -8 % के बीच गिरावट हुई। अप्रत्यक्ष प्रभाव, मसलन सिंचाई के स्रोत सूखने के कारण गेहूं उत्पादन में -4% से -36% तक नुकसान की आशंका है। एचटी की मीडिया रिपोर्ट में हरियाणा के करनाल में प्रमुख भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान के प्रमुख जीपी सिंह ने संशोधित अनुमानों का जिक्र किया और कहा, अत्यधिक तापमान के कारण गेहूं उत्पादन घटा है, लेकिन सौभाग्य से गिरावट इतनी तेज नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि गेहूं उत्पादन 109 मिलियन टन हुआ।

खेती में 30 फीसद अधिक पानी की खपत
जीपी सिंह भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान के प्रमुख हैं। उन्होंने 109 मिलियन टन गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया है लेकिन कृषि मंत्रालय के संशोधित उत्पादन अनुमान के मुताबिक इस वर्ष 103 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होने की उम्मीद है। इसी बीच लगातार बढ़ते तापमान के कारण भारतीय कृषि में और अधिक संसाधनों की जरूरत पड़ने लगी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा जारी अध्ययनों के अनुसार, आंध्र प्रदेश, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में "उच्च वाष्पीकरणीय मांग" (high evaporative demand) के कारण खेती में 30% अधिक पानी की खपत होती है।












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