Person of the Week: एमबीए करने के बाद अभिनव वशिष्ठ बने किसान

पटना। लाखों की भीड़ में एक अकेला ऐसा जरूर होता है, जो सबसे अलग हो, सबसे हटकर काम करे और मिसाल कायम करे। जी हां बिहार के छोटे से शहर शेखपुरा में ऐसी ही मध्यमवर्गीय भीड़ के बीच अभिनव वशिष्ठ है, जिसने ऐसा ही कुछ अलग किया है। आगे की खबर से पहले वनइंडिया अभिनव को सलाम करता है! सलाम इसलिये क्योंकि देश की रीढ़ की हड्डी यानी कृष‍ि को अभिनव जैसे लोगों की ही जरूरत है, जिन्होंने एमबीए करने के बाद कॉर्पोरेट जगत में जाने के बजाये, कृष‍ि को अपने करियर के रूप में चुना।

तो चलते हैं बिहार जहां ठंड के इस मौसम में अगर गांव की पगडंडियों के बीच खेतों में जींस और जैकेट पहने एक स्मार्ट युवक आपको जरूर मिल जायेगा। वो युवक और कोई नहीं बल्क‍ि अभिनव है। केवटी निवासी अभिनव ने एमबीए की पढ़ाई के बाद खेती को ही अपने जीवनयापन का जरिया बनाया है।

33 वर्षीय अभिनव ने गाजियाबाद के आईएमटी से एमबीए की पढ़ाई पूरी की है, लेकिन नौकरी के लिए कभी कोई प्रयास न कर अपने पूर्वजों के गांव आकर अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती बाड़ी शुरू कर दी। उनके इस प्रयास को देखकर न सिर्फ गांव के लोग इनकी प्रशंसा कर रहे हैं, बल्कि इलाके के कई व्यवसायी और नौकरी करने वालों ने भी कृषि को अपना आर्थिक आधार बना लिया है।

औरों से अलग कैसे है अभिनव के खेत?

आम तौर पर देश भर के किसान पारंपरिक खेती ही करते हैं। जब मौसम चला जाता है, तब दिहाड़ी मजदूर बनकर काम करने लगते हैं। लेकिन अभिनव के खेत कुछ अलग ही तस्वीर बयां कर रहे हैं।

  • अभिनव ने आईएमटी गाजियाबाद से एमबीए किया और उसी दौरान उनमें खेती की ललक जागी।
  • पढ़ाई के दौरान ही उन्हें एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान देहरादून जाने का मौका मिला।
  • औषधीय पौधों के बारे में जानकारी प्राप्त की। तभी ठान लिया कि वो इसी में अपना करियर बनायेंगे।
  • पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2004 में पांच एकड़ जमीन पर सुगंधित पौधों की खेती की शुरुआत की।
  • अभिनव ने पारंपरिक खेती से इतर जाकर औषधीय पौधों की खेती भी शुरू कर दी।
  • आज यह दायरा बढ़कर 10 एकड़ से ज्यादा हो गया है। यह अभिनव की बड़ी उपलब्ध‍ि है।
  • आज बिहार और उसके आस-पास से करीब 400 किसान अभिनव से जुड़ चुके हैं।
  • जो भी किसान उनसे जुड़े हैं उनकी आमदनी औषधीय खेती के बाद बढ़ी है।
  • उन्होंने मुख्य रूप से तुलसी, लेमन ग्रास और मेंथा (जापानी पुदीना) पर ही ध्यान केन्द्रित रखा है।
  • वशिष्ठ पंचानन हर्बल इंडस्ट्रीज के जरिए मार्केटिंग और कंसल्टेंसी का भी कार्य देख रहे हैं।
  • अभिनव को नौकरी में रुचि नहीं थी, वह अपने आप को कभी मशीन नहीं बनाना चाहते थे।
  • अभिनव कहते हैं जहां जन्मभूमि हो वहां के लिए भी अपना कोई कर्तव्य होता है।

राष्ट्रपति ने भी सराहा

अभिनव के प्रयास को राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटील, पूर्व राष्ट्रपति ए़ पी़ ज़े अब्दुल कलाम और बिहार के पूर्व राज्यपाल देवानंद कुंवर भी सराह चुके हैं, जबकि 2007 में उन्हें बिहार सरकार ने सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में 'किसान श्री' का पुरस्कार दिया था। वह बिहार औषधीय पादप बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। यानी सरकार ने भी उनके कार्य को सराहा है।

किस बात का मलाल

वशिष्ठ को इस बात का मलाल है कि सरकार द्वारा स्थानीय मजदूरों के पलायन को रोकने के कोई कारगर उपाय नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर मजदूरों का पलायन रुके तो कृषि के क्षेत्र में बिहार देश में अग्रणी बन सकता है।

क्या कहते हैं अभिनव से जुड़े लोग

पूर्णिया न्यायालय में वकील के रूप में कार्य कर रहे विक्रम लाल शाह आजकल खेती पर ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। शाह कहते हैं चार वर्ष पूर्व उन्हें औषधीय पौधों की जानकारी मिली थी और तब उन्होंने 40 हजार रुपये की लागत से तीन एकड़ भूमि में लेमनग्रास की खेती प्रारंभ की थी लेकिन आज वह 15 एकड़ में औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं।

वशिष्ठ से जुड़ने के बाद वैशाली के यदुनंदन राय और मनोज कुमार भी औषधीय खेती से जुड़े हैं। ये लोग पांच से छह एकड़ भूमि पर औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। औषधीय और सुगंधित पौध उत्पादन संघ के बिहार इकाई के सचिव गिरेन्द्र नारायण शर्मा भी वशिष्ठ के इस प्रयास की सराहना करते हैं।

वह कहते हैं, "किसानों की आर्थिक तंगी को व्यावसायिक खेती से दूर की जा सकती है। कई किसानों में जागरूकता का अभाव है जिस कारण अधिकांश किसान व्यावसायिक खेती और उसके उत्पाद की बिक्री से अनभिज्ञ हैं। राज्य में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती में विस्तार की असीम संभावनाएं मौजूद हैं।"

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