शिक्षक को मिला 'हाथी' गिफ्ट, 2000 KM का सफर तय कर अरुणाचल से पहुंचा यूपी, देखें Viral वीडियो
Teacher elephant gift story Viral story: उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में इन दिनों एक 'गजराज' की एंट्री ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा है। यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, जहां एक बेटा अपनी मां की इच्छा पूरी करने के लिए 2000 किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश से 8 साल का हाथी 'जात्रा सिंह' लेकर आया है।
बीजेपी नेता अशोक त्रिपाठी के घर जब यह नन्हा मेहमान ट्रक से उतरा, तो बैंड-बाजे और 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारों के साथ भव्य स्वागत हुआ। विरासत, सम्मान और ममता की इस अनोखी दास्तां ने छींटपुर गांव को रातों-रात एक 'तीर्थ' बना दिया है।

Jatra Singh elephant Pratapgarh: 2000 किलोमीटर का सफर और 'जात्रा' की एंट्री
अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों से निकलकर असम, बंगाल और बिहार की सीमाओं को लांघते हुए 'जात्रा सिंह' आखिरकार प्रतापगढ़ की धरती पर कदम रख चुका है। इस 8 साल के हाथी ने ट्रक में सवार होकर लगभग 2000 किलोमीटर का सफर तय किया। इसे लाने में करीब 1.5 लाख रुपये का खर्च आया और सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम रहे। जैसे ही जात्रा सिंह गांव पहुँचा, ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा कर उसका ऐसा स्वागत किया मानो साक्षात गणेश जी पधारे हों।
Arunachal to Pratapgarh elephant journey: पिता का सम्मान और मां की ममतामयी जिद
इस हाथी के पीछे एक भावुक कहानी छिपी है। अशोक त्रिपाठी के दिवंगत पिता राम प्रकाश त्रिपाठी अरुणाचल प्रदेश में प्रधानाचार्य थे। उनके सम्मान में वहां के लोगों ने साल 2023 में उनकी पत्नी केवल देवी को यह हाथी उपहार में दिया था। दो साल तक अरुणाचल में रहने के बाद, मां की ममता जात्रा सिंह को अपने करीब लाने के लिए मचल उठी। मां की इसी इच्छा को शिरोधार्य करते हुए अशोक त्रिपाठी ने कानूनी प्रक्रियाओं का लंबा सफर तय कर इसे घर लाने का फैसला किया।
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Ashok Tripathi Pratapgarh elephant: राजनीति से 'गजराज' की सेवा तक का सफर
अशोक त्रिपाठी प्रतापगढ़ के कद्दावर नेता और बड़े व्यवसायी हैं। बसपा से राजनीतिक पारी शुरू करने वाले त्रिपाठी अब बीजेपी का हिस्सा हैं। राजनीति की उठापटक के बीच उन्होंने अपनी पारिवारिक विरासत और धार्मिक आस्था को सर्वोपरि रखा। जात्रा सिंह के लिए गांव में खास बाड़ा बनवाया गया है और अरुणाचल से आए कुशल महावत उसकी दिन-रात सेवा कर रहे हैं। नेता जी का यह 'हाथी प्रेम' अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है।
पूजन, तिलक और गांव में उत्सव का माहौल
जात्रा सिंह के आने के अगले दिन छींटपुर गांव के मंदिर परिसर में उत्सव जैसा नजारा था। विधि-विधान से स्नान कराने के बाद हाथी का तिलक किया गया और मंत्रोच्चार के साथ पूजा-अर्चना हुई। गांव के बच्चे हों या बुजुर्ग, हर कोई इस नए मेहमान की एक झलक पाने और उसे पूजने के लिए बेताब दिखा। प्रसाद वितरण के साथ जात्रा सिंह को गुड़ और केले खिलाए गए। अब पूरा गांव जात्रा सिंह को अपने परिवार का हिस्सा मानने लगा है।
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कानून के घेरे में 'गजराज' का पालन-पोषण
हाथी पालना केवल शौक नहीं, बल्कि बड़ी कानूनी जिम्मेदारी भी है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत हाथी का उपहार लेना और उसे एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाना बेहद जटिल प्रक्रिया है। अशोक त्रिपाठी को वन विभाग से अनुमति लेने में करीब डेढ़ साल का वक्त लगा। विभाग ने हाथी के रहने, खाने और महावत की कुशलता की पूरी जांच करने के बाद ही अनुमति दी। जात्रा सिंह अब कड़े नियमों और विशेषज्ञों की देखरेख में अपनी नई पारी प्रतापगढ़ में शुरू कर चुका है।












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