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राजस्थान में तबादला नीति : नेताओं के लिए छींटाकशी का औजार बन गए सरकारी कर्मचारी-अधिकारियों के ट्रांसफर

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जयपुर, 16 जून। राजस्थान में हर बार तबादला मेला शुरू होते ही लाखों सरकारी कारिंदों की धड़कनें बढ़ जाती हों, लेकिन नेता और सरकारों के लिए यह प्रक्रिया सिर्फ एक-दूसरे पर छींटाकशी का सियासी औजार बनकर रह गई है। भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों के नेता एक-दूसरे पर हमले के लिए तबादला प्रक्रिया को 'बदले की भावना से प्रेरित', सरकार का 'तबादला उद्योग' जैसे शब्दों से अलंकृत करते हैं। लेकिन जब उनकी सत्ता रही तो आरोपों में घिरी रहने वाली इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने से कदम पीछे खींच लेते हैं।

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पूर्ववर्ती भाजपा सरकार और मौजूदा कांग्रेस शासन, दोनों ही काल में पारदर्शी तबादला नीति बनाने की कवायद तो जोर-शोर से शुरू हुई। लेकिन दोनों बार ही सरकार इसे सिरे नहीं चढ़ा सकी। नतीजा यह हुआ कि हर बार सरकारी कारिंदे सिफारिश के लिए नेता-मंत्रियों के दरवाजों पर चक्कर लगाने को मजबूर हुए।

कोई भी सरकार, नियम दरकिनार

राज्य में शीर्ष नौकरशाही यानि आइएएस, आइपीएस अधिकारियों के तबादलों में तो हर सरकार नियमों को सिरे से दरकिनार कर देती है। इस वर्ग के तबादलों संबंधी एक सवाल पर सरकार ने विधानसभा में भी माना कि इन संवर्गों में किसी पद पर तैनात अधिकारी का कार्यकाल पदोन्नति, सेवानिवृत्ति, राज्य के बाहर प्रतिनियुक्ति और दो माह से अधिक प्रशिक्षण को छोड़कर कम से कम दो वर्ष का होगा। लेकिन हर बार अपनी सहूलियत के हिसाब से तबादले होते हैं। नेता भले माने ना माने, लेकिन हालात यह हैं कि अब तो आम लोग भी नौकरशाहों के चेहरे को भाजपा और कांग्रेस से जोड़कर देखने लगे हैं।

तबादलों के लिए नीति जरूरी

तबादलों के लिए नीति तो होनी ही चाहिए। ऐसा नहीं है कि तबादलों के लिए पहले नीति नहीं होती थी। पहले नीति से तबादले होते थे। जब मेरे पास शिक्षा विभाग था, तब तबादलों के लिए नीति होती थी। इसी से ही तबादले होते थे। वैसे भी नीति कानून नहीं होती, ऐसे में जब लगे कि असाधारण परिस्थिति है तो कारण रेकॉर्ड पर लाकर शिथिलता दी जाए। सामान्य परिस्थिति में सिस्टम को ठीक रखने के लिए जरूरी है कि नीति से ही तबादला होने चाहिए। - इन्द्रजीत खन्ना, पूर्व मुख्य सचिव

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English summary
Politics dominates transfer of government employees and officers in Rajasthan
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