तेलंगाना में हथकरघा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए अपनाया जा रहा ये नया तरीका
तेलंगाना में हरकरघा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए नया तरीका अपनाया गया है। हरकरघार परिवारों को जियो कोड करने और छोटे समूहों की सामुदायि आवश्यकताओं को पूरा करने लिए जीआईएस (भौगोलिक सूचना प्रणाली) सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाएगा। क्लसटर विश्लेषण लागू करने के उद्देश्य से हैदराबाद विश्वविद्यालय (यूओएच) की डॉ. शीला सूर्यनारायण ने अपनी शोध टीम के साथ तेलंगाना के कई क्षेत्रों का दौरा किया।

तेलंगाना में यदाद्री भुवनगिरि, वानापर्थी, जोगुलम्बा गडवाल, महबूबनगर और नारायणपेट जिलों का टीम ने दौरा किया। हथकरघा श्रमिकों की व्यावसायिक स्वास्थ्य स्थिति, महिला सशक्तिकरण और विपणन से से संबंधित जानकारी इस टीम ने एकत्र की। इसके साथ ही नीतिगत जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से इसका विश्लेषण किया जाएगा।
मीडिया को दिए इंटरव्यू में हैदराबाद विवि की डॉ शीला सूर्यनारायण ने कहा तेलंगाना में हरकरघा क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के साथ सक्रिय रूप से इस काम में पूरे समय काम करती हैं इसके अलावा घरेलू जिम्मेदारियों को निपटाने के एि अतिरिक्त घंटे काम करती हैं।
इनमें जो बुनकर महिलाएं हैं उनमें से अधिकतर श्रमिक सहयोगी के तौर पर काम करती हैं। बड़ी संख्या में पुरुष करघे का काम करते हैं और महिलां उनके साथ सहायक के तौर पर काम करती हैं। पुरुष अपने काम में महिलाओं के योगदान के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि महिलाओं के बिना हम कोई काम नहीं कर सकते।
डॉ शीला सूर्यनारायण ने कहा तेलंगाना में बड़ी संख्या में हरकरघा श्रमिकों के पास बैंक खाते हैं और शिक्षा का अच्छा स्तर और मोबाइल तक व्यापक पहुंच है लेकिन ये उनका उपायोग नहीं करते। उन्होंने कहा हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं को विपणन में सक्रिय रूप से शामिल करने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए और ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कई हथकरघार भू-अतिक्रमित नहीं हैं और ऐसे भी जहां पर हथकरघा श्रमिकों के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है। जबकि वे हथकरघा गतिविधियों में लगे हुए हैं।
हरकररघा क्षेत्र में विपणन की परेशानियों और रेशम धागे जैसे सामग्रियों की अधिक लागत की चुनौतियों ने हरकरघा श्रमिकों का आय स्तर कम ही रहा है। ये कारण है अक्सर समर्थन के लिए मास्टर बुनकरों या सहकारी समितियों पर निर्भर रहते हैं। पारंपरिक कला के रूप में इसके महत्व को देखते हुए, भारत में हथकरघा क्षेत्र पर व्यापक, केंद्रित अध्ययन आवश्यक है। ये तय करना होगा कि इन श्रमिकों को कम वेतन न मिले और यह क्षेत्र पर्याप्त रूप से संरक्षित हो। इस क्षेत्र को समर्थन और पुनर्जीवित करने के लिए पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया जब करघे पर काम करने वाले किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो महिलाओं अक्सर काम छोड़ देती हैं, और उनके पास अक्सर विशिष्ट स्वास्थ्य बीमा नहीं मिल पाता है। हथकरघा श्रमिकों को विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक स्वास्थ्य समस्याएं झेलनी पड़ती हैं।
डॉ शीला ने बताया SFRUTI (Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries) कार्यक्रम कुछ हद तक सफल हुए हैं लेकिन महत्वपूर्ण प्रभाव पैदा करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अक्सर इन कार्यक्रमों में सदस्यों के रूप में पुरुषों की अधिक भागीदारी देखी जाती है, महिला लाभार्थी नहीं होती हैं। इसका प्रमुख कारण जानकारी और जागरूकता का अभाव है।












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