हरियाणा में हथनीकुंड बैराज बनेगा प्राकृतिक पर्यटन केंद्र, टूरिस्ट कर सकेंगे राफ्टिंग
चंडीगढ़, 12 जुलाई। पांच राज्यों की प्यास बुझाने वाला हथनीकुंड बैराज अब प्राकृतिक पर्यटन का केंद्र बनने जा रहा है। अब यहां पर जल्द ही पर्यटक राफ्टिंग करते नजर आएंगे। इसके लिए सिंचाई विभाग की जोंरों पर तैयारी चल रही है। बैराज से उत्तर प्रदेश, हरियाणा सीमा पर है। यहां से दिल्ली, हिमाचल, राजस्थान, दक्षिण हरियाणा समेत उत्तर प्रदेश में नहरों के माध्यम से पानी की सप्लाई होती है। बता दें कि केंद्रीय जल आयोग समझौते के मुताबिक राजस्थान के हिस्से का शेयर भाखड़ा से दिया जाता है और उसके हिस्से का पानी यहां पर हरियाणा प्रयोग होता है।

हथनीकुंड बैराज को टूरिस्ट हब बनाए जाने की तैयारी जोरों पर है। बैराज पर वाटर स्पोर्ट एक्टिविटीज होगी। गत दिनों टूरिज्म डिपार्टमेंट की टीम ने भी यहां दौरा किया था। सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार तेज बहाव से करीब 100 मीटर की दूरी को छोड़कर बाकी एरिया में यह एक्टिविटीज होंगी। बोटिंग मोटर बाइक व अन्य गतिविधियां करवाई जाने की योजना है। इससे दूर दराज से आने वाले सैलानियों की संख्या बढ़ेगी। बैराज के पास ही थीम पार्क बनाए जाने की योजना पर काम चल रहा है। 12 करोड़ की लागत से थीम पार्क 23 एकड़ जमीन में बन रहा है। यहां दो एकड़ में लेक तैयार होगी। इसमें भी बोटिंग समेत अन्य गतिविधियां हो सकेंगी। इसके अलावा बच्चों के खेलने के लिए पार्क, नक्षत्र केंद्र, मनोरंजन के लिए भूल भुलैया व रेस्टोरेंट, घूमने के लिए झूले, पीने का साफ पानी, शौचालय, सेल्फी प्वाइंट आदि सुविधाएं दी जाएंगी। यहां पर्यटक पूरी तरह प्रकृति का आनंद ले सकेंगे।
जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर यमुना नदी पर बने हथनीकुंड बैराज का उद्घाटन नौ जुलाई 1999 को तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. बंसीलाल ने किया था। अपने वाहन के अलावा हरियाणा रोडवेज की बस से प्रतापनगर होते हुए आसानी से बैराज पर पहुंचा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर से भी बस सर्विस है। बैराज के 18 गेट हैं। जिसमें 15 गेट हरियाणा और तीन उत्तर प्रदेश को लगते हैं। बैराज की क्षमता 10 लाख क्यूसेक पानी के दबाव की है। मानूसन सीजन में हर एक घंटे के अंतराल के बाद वाटर लेवल की रिपोर्ट प्रदेश व केंद्र सरकार के पास भेजी जाती है ताकि समय रहते प्रशासन बाढ़ बचाव के इंतजाम पूरे कर आसपास के क्षेत्र में अलर्ट करवाया जा सके। बैराज से ही पश्चिमी यमुना नहर से दिल्ली व पूर्वी नहर उत्तर प्रदेश में पानी का बटवारा किया जाता है। हथनी कुंड बैराज से पहले इसके पा ब्रिटिश काल में ताजेवाला हेड वर्कस तैयार किया था। 128 वर्ष तक इस बैराज ने सेवाएं दी। वर्ष 2012 में आई बाढ़ में यह बैराज बह गया था। अब यहां पर इसके अवशेष खड़े है। अधिकारियों की अनदेखी के कारण यह बैराज बाढ़ की चपेट में आया। ये अवशेष भी लोगों का आकर्षित करते हैं।
बैराज के पास ही हिमालय के शिवालिक पर्वतमाला में प्रतापनगर एरिया में स्थित कलेसर नेशनल पार्क बहुत ही खूबसूरत पर्यटन स्थल है। जंगल की सीमा तीन राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश से लगी हुई है। आठ दिसंबर 2003 को 11570 एकड़ में फैले जंगल को राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ। पार्क के नजदीक ही कलेसर वाइल्डलाइफ सेंचूरी है। पार्क जैव विविधता गुफाओं के साथ वन, खैर के जंगलों, घास जंगली जानवरों के लिए अनुकूल है। घने जंगलों में शाकाहारी सांभर, चीतल, बार्किंग डीयर, गोरल, हिरण, नील गाय, नील बैल, जंगली सुअर, जंगली मूर्गा बड़ी संख्या में है। वन विभाग की गाड़ी पर्यटकों को जंगल में घुमाती है हालांकि बरसात में जंगल बंद कर दिया जाता है। वन्य जीवप्राणी आसानी से दिखाई देते हैं।
बैराज से पांच किमी दूर कलेसर से पहले प्रतापनगर से ताऊ देवी लाल हर्बल पार्क चुहड़पुर का रास्ता जाता है। यहां प्राकृतिक जड़ी बूटियों का भंडारा है। यह 184 एकड़ जमीन पर फैला है। इसमें 350 से ज्यादा दुर्लभ जड़ी बूटियों का संग्रह किया गया है। यहां पर मिजाइल मैन पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम भी आ चुके हैं। उन्होंने ही पार्क का उद्घाटन किया था। आज भी पार्क में वह कुर्सी रिर्जव है जिस पर वह बैठे थे। बिलासपुर-प्रतापनगर मार्ग पर लेदी गांव के निकट प्रदेश का इकलौता हाथी पुनर्वास केंद्र बनसंतौर है। वर्ष 2008 में करीब एक करोड़ की लागत से 50 एकड़ जमीन पर चौ. सुरेंद्र सिंह हाथी पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई। केंद्र में पांच हाथियां रखने के इंतजाम है। फिलहाल यहां पर चार हथनियां हैं।
पर्यटन मंत्री कंवरपाल गुर्जर का कहना है कि होम स्टे पालिसी भी जल्द प्रदेश में लागू करेंगे। जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के िलए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। जिला प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। एक साइड में सूर्य की पुत्री यमुना बह रही है। पवित्र सरस्वती नदी का उद्गम स्थल भी जिले में ही है। दूसरे छोर अंबाला में मारकंडा नदी भी निकलती है। यहां पर पर्यटन के साथ साथ धार्मिक पर्यटन के भी काफी संभावनाएं है। इस दिशा में भी काम चल रहा है।












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