तेलंगाना में भाजपा की नई मुश्किल, दलित-आदिवासी विरोधी छवि ने रोका चुनावी अभियान
तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीनों का वक्त बचा है लेकिन केंद्र में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
दरअसल, राज्य में भारतीय जनता पार्टी, तेलंगाना विधानसभा चुनाव से पहले दलित और आदिवासी समुदायों को लुभाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसकी दलित विरोधी और आदिवासी विरोधी छवि इसमें अड़ंगा डाल रही है।

दलितों और आदिवासी वोटों को अपने पाले में करने के लिए भाजपा ने कई कार्यक्रम शुरु किए हैं, लेकिन उसे किसी भी कार्यक्रम में कोई खास सफलता मिलती हुई नजर नहीं आ रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि तेलंगाना में सरकार चला रही भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के पास दलितों और आदिवासियों का मजबूत समर्थन है।
राज्य में अनुसूचित जाति के लिए 19 और अनुसूचित जनजाति के लिए विधानसभा की 12 सीटें हैं और उनमें से ज्यादातर, विशेष रूप से एससी आरक्षित सीटें, सत्तारूढ़ बीआरएस के पास हैं। वर्तमान में, 17 एससी आरक्षित सीटें बीआरएस के पास हैं और दो कांग्रेस के पास हैं। जबकि 12 एसटी आरक्षित सीटों में से सात बीआरएस के पास और पांच कांग्रेस के पास हैं।
हालांकि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई को इन दोनों समुदायों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया है, लेकिन पार्टी के स्थानीय नेता पूरी तरह जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। वो अच्छी तरह जानते हैं कि पार्टी का इन आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में कोई आधार नहीं है। वो ये भी जानते हैं कि 2018 के विधानसभा चुनावों के दौरान सभी आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।
पिछले चुनावों में भाजपा ने 6.98 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सिर्फ एक विधानसभा सीट जीती थी, जबकि सत्तारूढ़ बीआरएस (तत्कालीन टीआरएस) ने 46.87 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 88 सीटें जीती थीं। वहीं कांग्रेस को 28.43 प्रतिशत वोट शेयर मिला था।
पार्टी नेताओं का साफ कहना है कि दलितों और आदिवासियों का समर्थन ना मिलना, उन वजहों में से एक थी जिसके कारण भाजपा तेलंगाना में चुनाव नहीं जीत पाई। पार्टी की दलित और आदिवासी विरोधी छवि भी स्थानीय नेतृत्व के लिए इन दोनों समुदायों का समर्थन हासिल करने में दिक्कतें पैदा कर रही है।












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