एक मां के श्राप से हारे थे श्रीकृष्ण, छोड़ना पड़ा था संसार...

नई दिल्ली। कहते हैं सृष्टि का आधार मां है। स्त्री के मातृ रूप, उसकी मातृ शक्ति को सारा संसार नमन करता आया है। मनुष्य क्या, ईश्वर स्वयं भी स्त्री की ममता, अपनी संतान के लिए उसके मोह के आगे नतमस्तक है।

यूं तो सारे भारतीय पौराणिक ग्रंथों में विभिन्न रूपों में मां और उसकी ममता की अनेक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं, लेकिन महाभारत में एक ऐसा संदर्भ मिलता है, जो प्रमाणित करता है कि मां के अपनी संतान के प्रति प्रेम के आगे स्वयं भगवान ने भी सिर झुकाया है। यह अद्भुत कथा है कौरवों की माता गांधारी और महाभारत युद्ध के प्रमुख नायक भगवान श्री कृष्ण की।

महाभारत का महायुद्ध

महाभारत का महायुद्ध

ये तो सर्वविदित है कि तमाम षडयंत्रों, दांव-पेंचों और छल-कपट के बाद महाभारत का वह महायुद्ध संपन्न हुआ, जिसने भव्य भारतवर्ष के कल्पांत को साकार किया। इस युद्ध में कौरवों की पराजय के साथ जाने कितने ही महारथी काल-कवलित हो गए। इसी युद्ध में पांडवों की विजय के साथ एक नए भारतवर्ष के उदय की प्रस्तावना लिखी गई।

वंश का समूल नाश

वंश का समूल नाश

हस्तिनापुर का साम्राज्य पांडवों के अधीन हो गया। महाभारत के युद्ध ने कितनी ही मांओं की गोदें उजाड़ दीं, पर उनमें से एक ऐसी भी थी, जिसकी पीड़ा अविनाशी थी। वह थी हस्तिनापुर की महारानी, सौ कौरवों की माता गांधारी, जिसके सारे ही पुत्र इस युद्ध की भेंट चढ़ गए थे। महारानी गांधारी ने अपने समस्त पुत्रों के साथ ही अपने वंश का समूल नाश अपने सामने होते हुए पाया। इससे भी अधिक दुख उन्हें इस बात का था कि श्री कृष्ण के होते हुए उनके साथ ऐसा अन्याय कैसे हो गया।

श्री कृष्ण सारे संसार के पालक हैं

श्री कृष्ण सारे संसार के पालक हैं

ज्ञात हो कि श्री कृष्ण पांडवों के साथ-साथ कौरवों में भी समान रूप से पूजनीय, सम्माननीय थे। इसीलिए गांधारी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि श्री कृष्ण के होते हुए उनके वंश का पूरी तरह नाश हो जाएगा। उनका मन इस होनी को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। उनका अंतर्मन बार-बार चीत्कार कर कह रहा था कि जो श्री कृष्ण सारे संसार के पालक हैं, कर्ता-धर्ता हैं, जिनके संकेत मात्र पर यह समस्त विश्व चलायमान है, वे अगर चाहते तो महाभारत का युद्ध रोक सकते थे। ना युद्ध होता, ना कुरूवंश निरवंश होता।

गांधारी का श्राप

गांधारी का श्राप

इस तरह मोह में अंधा हुआ मां का मन पुत्र हत्या की पीड़ा से धधक रहा था और हर तरफ से घूम फिरकर श्री कृष्ण को ही दोषी मान रहा था। इस मनो स्थिति में विक्षिप्त सी हो गई गांधारी के पीड़ादग्ध हृदय से श्री कृष्ण के लिए श्राप निकल पड़ा। उन्होंने कहा कि हे कृष्ण, जिस तरह तुम्हारे कारण मेरे समूल वंश का नाश हुआ है, एक दिन इसी तरह का घमासान तुम्हारे वंश में भी होगा, तुम भी अपनों को लड़ते, मरते देखोगे और कुछ नहीं कर पाओगे। मेरी ही तरह तुम भी इस पीड़ा में प्राण त्यागोगे। श्री कृष्ण ने सिर झुकाकर गांधारी के श्राप को शिरोधार्य किया।

श्राप 36 साल बाद फलीभूत हुआ

श्राप 36 साल बाद फलीभूत हुआ

पौराणिक प्रमाणों के अनुसार गांधारी का श्राप महाभारत युद्ध के 36 साल बाद फलीभूत हुआ। इस समय तक यादव वंश में कौरवों और पांडवों की ही तरह मार-काट मच गई थी। यदुवंशी आपस में ही एक दूसरे को क्षति पहुंचाने में प्राण दे रहे थे। अपने वंश के इस पतन से दुखी श्री कृष्ण विचार मंथन के लिए जंगल के एकांत में गए थे और एक पेड़ से पीठ टिकाकर, पैर फैलाकर आंखें बंद किए बैठे थे। इसी समय जरा नाम का एक शिकारी वहां शिकार की खोज में आया। भगवान के फैले हुए गुलाबी पैर उसे हिरण के कान मालूम पड़े और अनजाने में उसने तीर चला दिया, जो निशाने पर लगा। इस तरह गांधारी का श्राप फलित हुआ और अपने वंश का नाश अपनी आंखों के सामने देख, चिंता में डूबे श्री कृष्ण संसार त्याग कर भगवान विष्णु में समाहित हो गए।

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