Ramadan 2018: जानिए रमजान का महत्व, क्योंं रखा जाता है 'रोजा'?
नई दिल्ली। पाक-साफ महीने 'रमजान' की शुरूआत हो चुकी है, इस्लामिक कैलेंडर का यह महीना त्याग, सेवा, समर्पण और भक्ति का मानक है, इस्लाम में रमज़ान या रमदान को बेहद पवित्र माना जाता है, यह इस्लामी कैलेंडर का नवां महीना है, रमजान को कुरान के जश्न का भी मौका माना जाता है। इस दौरान सभी इस्लामिक लोग रोजा रखते हैं।

रमजान के महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं
मान्यता है कि रमजान के महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जो रोजे रखता हैं उसे ही जन्नत नसीब होती है।पैंगम्बर इस्लाम के मुताबिक रमजान महीने का पहला अशरा (दस दिन) रहमत का, दूसरा अशरा मगफिरत और तीसरा अशरा दोजख से आजादी दिलाने का है। यह महीने प्रेम और अपने ऊपर संयम रखने का मानक है इसलिए कहा गया है कि हर मुसलमान को रोजा जरूर रखना चाहिए।

क्या करें और क्या ना करें
इस दौरान केवल अल्लाह की इबादत करनी चाहिए और सहरी और इफ्तार का खास ख्याल रखना चाहिए। इस दौरान शराब, सिगरेट, तंबाकू और नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बच्चे, गर्भवती महिलाएं. नवजात की मांओं और सफर करने वाले यात्रियों को रोजा ना रखने की मनाही है।

हर इंसान को 'जकात' देना होता है
रमजान के दौरान हर मुस्लिम को 'जकात' देना होता है। आपको बता दें कि 'जकात' का मतलब अल्लाह की राह में अपनी आमदनी से कुछ पैसे निकालकर जरूरतमंदों को देना। कहा जाता है 'जकात' को रमजान के दौरान ही देना चाहिए ताकि गरीबों तक वो पहुंचे और वो भी ईद मना सकें।

नब्ज को शुद्धि करने का नाम है 'रोजा'
रोजा में सिर्फ खाने पीने की बंदिश नहीं है बल्कि हर उस बुराई से दूर रहने की बंदिश है जो इस्लाम में मना है। इस्लाम के मुताबिक 'रोजा' केवल भूखे प्यासे रहने का ही नाम नहीं बल्कि नब्ज़ को व्यवस्थित और शुद्धि करने का नाम है और हर वर्ष 30 दिन अपनी आत्मा को शुद्ध करके हम शेष 11 महीने इसी जीवन को जीने की ट्रेनिंग पाते हैं। इस दौरान हम अल्लाह का शुक्र भी अदा करते हैं और इसलिए महीने के अंत में ईद मनाई जाती है।












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