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महाकुंभ: ऐसे ही नहीं बन जाते हैं नागा बाबा

नंग-धड़ंग, जटा-जुट, भभूत, अस्त्र, शस्त्र से सुशोभित नागा बाबाओं को पहली नजर में कोई भी देखे तो डर जाए। अपनी भायवह रुप-रंग के लिए विश्व भर में विख्यात नागा बाबा केवल कुंभ के दौरान ही सार्वजनिक होते हैं। साल के बाकी समय ये समाज से अलग-थलग होकर वैराग्य का जीवन व्यतीत करते हैं। इनका जीवन भी उतना ही कठिन होता है, जितना सेना के एक जवान का। बड़ी-बड़ी जटाजुट केश, हाथ में तरह-तरह के हथियार, शरीर पर भस्म लपेटे नग-घड़ंग भेष में जब इन बाबाओं की टोली निकलती है, तो उन रास्तों को खाली करा लिया जाता है, जहां से टोली गुजरने वाली होती है।

नागा बाबा देखने में इतने आक्रमक लगते हैं कि लोग डर से अपने मार्ग बदल देते है। जुलूस में तरह-तरह के हथियारों का प्रदर्शन करते हुए ये लोग अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। ये मौका होता है जब एक अखाड़ा दूसरे अखाड़े से अपने आप को ऊंचा दिखाने की होड़ में लगा होता है। शक्ति प्रदर्शन के दौरान प्रशासन की ओर से भी सुरक्षा के सख्त इंतजाम किए जाते हैं। इनका ये रुप और इनकी ये भयावकता एक दिन में नहीं आता और ना ही इनका जीवन इतना सरल होता है। इनका मनोबल इतना अडिग होता है, कि ये बिना कपड़ों के भी अपने आपको समाज में लाने से नहीं हिचकते। भभूत प्रेमी इन नागा बाबाओं के पीछे एक लम्बा इतिहास है।

इसमे कोई दो राय नहीं कि भारत हमेशा से शांति का प्रचारक रहा है और यहां के साधु-महात्मा भी हमेशा से सीधे-साधे रहे है लेकिन साधुओं की एक ऐसी भी जमात है, जिसने भारत पर समय-समय पर होने वाले आक्रमणों के खिलाफ हथियार उठा लिया। इन आक्रमणों के प्रतिउत्तर के स्वरुप ही हमारी संस्कृति में नागाओं का पदार्पण हुआ। सरल शब्दों में अगर कहें तो जिन साधुओं के सहजता से गर्दन कटाना स्वीकार नहीं कि वे नागा बाबा बन गए और शस्त्र उठा लिया ताकि सनातन धर्म को बचाया जा सके।

इन साधुओं ने दुनिया को ये संदेश दिया कि भारत के साधुओं ने हाथों में चुड़ियां नहीं पहन रखी हैं। नागा बाबाओं की जीवन शैली को अगर देखा जाए तो एक नागा बाबा को तैयार होने में तकरीबन 12 साल लग जाते हैं। नागा बाबा की उपाधि हासिल करने के लिए इन्हें कठोर वैराग्य जीवन बिताना होता है। अपनों को छोड़कर सारी सांसरिक खुशियों को त्यागकर ये लोग समाज की नजरों से दूर जीवन बिताते हैं। 12 सालों की कठिन तपस्या के बाद नागा बाबा अखाड़ों में शामिल होते हैं। ये गांजा पीते हैं, ताकि खुद को आध्यात्मिक रुप से आत्मिक और धार्मिक शक्तियों में बदल सकें। गांजे से इन्हें अपना ध्यान केन्द्रित करने में बल मिलता है। तप के बल से ये अपने को कठोर बनाते हैं।

शरीर पर भभूत लपेट कर ये अपनी आकर्षकता को खत्म करते हैं ताकि आम लोग इनसे दूर रहें। साथ ही इससे इनके वैराग्य को बल मिलता है। लोगों की नजरों में खराब दिखाने के लिए ये साधु कितना कष्ठ झेलते हैं। इन सब जतनों से ये अपने आपको सशक्त बनाते हैं। इनके मन में खुद को आकर्षणहीन बना कर भी कितनी प्रसन्नात होती है। इनका मनोबल कितना मजबूत होता है इनका अंदाजा भी लगाता आसान नहीं होगा। हां लेकिन आप आंकलन जरुर कर सकते है कि कपकपाती ठंड हो या फिर चिलचिलाती धूप ये साधु साल भर इसी तरह से बिना कपड़ों के अपना जीवन व्यतीत करते हैं। साल का अधिकांश समय ये हिमायल की कंदराओं में तप करने में बिताते हैं। केवल खास अवसरों पर खासकर कुंभ के समय में ही ये गंगा स्नान के लिए सार्वजनिक होते हैं।

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