Sankat Chaturthi 2023: कब है संकटचतुर्थी? क्या है पूजा विधि, कथा और महत्व?
Sankat Chaturthi significance: जो कोई भी चैत्र मास की संकट चतुर्थी का उपवास रखता है, उसके जीवन के सारे कष्ट छू-मंतर हो जाते हैं और घर मे सुख-शांति और वैभव का वास होता है।

Sankat Chaturthi 2023: चैत्र मास की संकट चतुर्थी 11 मार्च 2023 शनिवार को सर्वार्थसिद्धि योग में आ रही है। इस दिन व्रत रखकर भगवान गणेश का पूजन कर रात्रि में चंद्र दर्शन करके व्रत पूरा किया जाता है। भगवान गणेश और चंद्र देव की कृपा से सारे संकट समाप्त होते हैं। यह व्रत महिला-पुरुष दोनों समान रूप से करते हैं। इससे परिवार के समस्त संकट दूर होते हैं, आर्थिक समस्या दूर होती है। चैत्र मास की इस संकट चतुर्थी को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। 11 मार्च को चंद्रोदय रात्रि 10 बजे होगा। सर्वार्थसिद्धि योग में आ रही इस चतुर्थी में व्रत करने वाले के सारे संकट दूर होंगे।
कैसे करें पूजन
चतुर्थी के दिन सूर्योदप पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर सूर्य को जल का अर्घ्य दें। अपने पूजा स्थान को साफ-स्वच्छ करें और दैनिक पूजा करने के बाद संकट चतुर्थी व्रत का संकल्प लें। दाहिने हाथ में थोड़ा सा जल लेकर, उसके सिक्का, पूजा की सुपारी, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत करने का संकल्प लें। जिस कार्य के लिए व्रत कर रहे हैं उसका भी मानसिक ध्यान करें। इसके बाद गणेशजी का षोडशोपचार पूजन करें। गणेशजी को दूर्वा, सिंदूर, पुष्प आदि अर्पित करें। इसके बाद दिनभर निराहार रहें। जो लोग भूख, प्यास सह नहीं सकते वे फल या फलों का ज्यूस ले सकते हैं। इसके बाद सायंकाल सूर्यास्त के समय पुन: गणेश जी का पूजन करें, ज्योत लें। चतुर्थी की कथा सुनें या पढ़ें। इसके बाद चंद्रोदय होने तक जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। चंद्रोदय होने पर चंद्र के दर्शन पूजन करें। चंद्र को अर्घ्य दें। इसके बाद गणेशजी को नैवेद्य लगाकर भोजन ग्रहण करें।
संकट चतुर्थी व्रत कथा
संकट चतुर्थी के संबंध में पुराणों में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। सर्वाधिक प्रचलित और पौराणिक कथा के अनुसर एक बार देवताओं पर संकट आ गया। तब वे सहायता के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। उस समय भगवान शिव के साथ गणेश और कार्तिकेय दोनों बैठे थे। शिवजी ने कार्तिकेय और गणेश जी से पूछा कि देवताओं की समस्याओं का निवारण कौन करेगा, इस पर दोनों से स्वयं को सक्षम बताते हुए संकट का निवारण करने की बात कही। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेने का निर्णय लेते हुए कहा कि दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की सहायता करने जाएगा।
सारे संकट दूर होंगे
पिता शिव का आदेश सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने चल पड़े। किंतु गणेश जी ने युक्ति लगाई और अपने माता-पिता की सात परिक्रमा करके वापस अपने स्थान पर बैठ गए। इस पर शिवजी प्रसन्न हुए और गणेशजी को ही देवताओं का संकट दूर करने की आज्ञा दी। साथ ही कहा कि चतुर्थी के दिन जो गणेश का पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके सारे संकट दूर होंगे।












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