साल 2022 का पहला दिन शनिदेव के नाम, कीजिए आरती और दशरथश्रोत का पाठ, मिलेगा लाभ
नई दिल्ली, 31 दिसंबर। साल का पहला दिन शनिवार से शुरू हो रहा है इसलिए कीजिए शनिदेव की आरती और पाइए शुभ लाभ। ऐसा करने से इंसान के सारे कष्टों का अंत जल्द हो जाएगा और उसे सुख की प्राप्ति होगी।

शनिदेव की आरती
- जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ।
- सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
- ॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
- श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी ।
- नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥
- ॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
- क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी ।
- मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी ॥
- ॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
- मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी ।
- लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥
- ॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
- देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी ।
- विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥
- ॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
दशरथकृत शनि स्तोत्र
- दशरथ उवाच:
- प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः ॥
- रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन् ।
- सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी ॥
- याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं ।
- एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम् ॥
- प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा ।
- पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ॥
- दशरथकृत शनि स्तोत्र:
- नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।
- नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥
- नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
- नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥
- नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।
- नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥
- नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
- नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥
- नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।
- सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥
- अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।
- नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥
- तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
- नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥
- ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
- तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥
- देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।
- त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥
- प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।
- एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥
- दशरथ उवाच:
- प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।
- अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित् ॥












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