भगवान राम क्यों अपने करीब रखना चाहते हैं हनुमान को?
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)। क्या कभी आपने सोचा कि राम ने हनुमान जी को अपने से दूर क्यों नहीं जाने दिया। दरअसल वे उन सबका सम्मान करते हैं, जो उनके साथ आड़े वक्त में खड़े थे। इसका एक उदाहरण रामचरित मानस में मिलता है। राम अपनी सेना के साथ वापस अयोध्या लौटते हैं। राम के अयोध्या लौटने पर आनंद का वातावरण है। सब प्रसन्न हैं। अयोध्या में आलोकसज्जा हो रही है। इस क्रम में कुछ सप्ताह गुजर जाते हैं। इसके साथ ही राम का जीवन हरेक निराशा में डूबे शख्स को आशा देते हैं।
राम को भी जीवन के 14 वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था। पर वे वहां से वापस लौटकर अयोध्या के राजा बने। ये उदाहरण निराशा में डूबे किसी भी शख्स के लिए संजीवनी का काम कर सकता है।
हनुमान भी हैं
बहरहाल, राम अयोध्या में एक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। उसमें वे उन सभी साथियों के प्रति आभार जताते हैं,जो रणभूमि में उनके साथ थे। वहां पर हनुमान भी हैं। बाकी योद्धा भी हैं।
ठिठकते राम
तुलसी कहते हैं, राम सबके पास जाकर उन्हें उपहार देते हैं। अंत में वे हनुमान जी के पास पहंचते हैं। पर राम यहां पर ठिठकते हैं। हनुमान जी उनके चरणस्पर्श करते हैं। उन्हें गले लगाते हुए, राम कहते हैं कि मैं आपके ऋण से मुक्त नहीं होना चाहता। आपको मेरे साथ यहां पर रहना होगा। यही तो हनुमान जी चाहते थे।
राम खासतौर पर हनुमान का सम्मान करते हैं।राम की वानर राजा सुग्रीव से मैत्री करवाई। सीता को खोजा। युद्ध में लक्ष्मण के घायल होने के बाद संजीवनी बूटी लेकर आए। ये तो कुछेक उदाहरण है हनुमान जी के राम के प्रति उनकी भक्ति के।
महाभारत का उदाहरण
महाभारत में भी राम के अयोध्या से वनवास जाने से मिलता-जुलता उदाहरण मिलता है। कृष्ण ने पांडवों को इंद्रप्रस्थ राज्य की स्थापना में मदद की। पर पांचों भाइयों ने कृष्ण की अनुपस्थिति में उसे जुए में गंवा दिया। इस कारण पांचों पांडव भाइयों को 12 वर्षो तक अज्ञातवास में धक्के खाने पड़े।













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