कविता: वक्त किसी का हुआ नहीं ... न इसे किसी की चाह

'वक्त किसी का हुआ नहीं है,
न इसे किसी की चाह है !
वक्त है चलता नियत वेग से,
न रोके इसे कोई राह है !!'

'वक्त को रोक न पाये है,
न अनल न वायु की चाल है!
वक्त को फांस न पाये है,
किसी आखेटक के जाल है !! '

'है वक्त किसी बेवक्त वक्त मे,
हमे ऐसा वक्त दिखाता है !
जीवन मे जो कभी न भूले,
ऐसी इक सीख सिखाता है !!'

हो गये वक्त के पाबन्द सभी,
हर किस्म के इंसान है !
है वक्त के गुलाम अफसर,
और वक्त के ही किसान है !!'

'वक्त के संग सूर्य है ,
इन्दु-तारे भी वक्त पे चलते हैं !
वक्त पे होती खुशियां हैं ,
कई दिल वक्त पे जलते हैं !!'

'इक वक्त हर इंसान को,
ऐसे मोड पर लाता है !
राह मझधार से बदलकर,
ऐसे छोडकर जाता है !!'

'उठ न पाये कोई फिर,
वो बन्धन ये जोड जाता है !
देके है जख्म सीने पर,
फिर ग्रीवा मरोड जाता है !!'

इसलिये-:

'हर वक्त वक्त को इतना,
सभी मजबूर कर दीजिये !
तोड्कर ये सब बन्दिशें ,
ये गुलामी दूर् कर लीजिये !!'

'इक वक्त वक्त को इतना,
सब बेवक्त कर दीजिये !
करके कुछ पीछे वक्त को,
खुद को शशक्त कर लीजिये !!'

'वक्त के पीछे न चलिये,
अरे नये जमाने वालो !
वक्त को पीछे चलवाइये,
ओ चन्द कमाने वालो !!'

'वक्त की कर पहचान लो,
वक्त पे कुछ खोने वालो !'
वक्त से गुलामी करवाइये,
बेवक्त वक्त पे सोने वालो !!'

'वक्त को इतनी दहशत दे दो,
कि हर वक्त वक्त थर्राने लगे !
इक वक्त वक्त को ऐसा सुधारो,
कि मनुज फिर गर्राने लगे !!'

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