Delhi Gymkhana के बाद Mumbai के Breach Candy का नंबर? 1 Cr की मेंबरशिप, शशि थरूर को नहाते हुए निकाला था बाहर
Mumbai Breach Candy Club: दिल्ली जिमखाना क्लब के बाद अब मुंबई का ब्रीच कैंडी क्लब निशाने पर आ गया है। 148 साल पुराने इस क्लब में अंग्रेजों की छाप साफ नजर आती है। इसकी मेंबरशिप के लिए 1 करोड़ रुपए चुकाने पड़ते हैं। इसके अलावा सालाना फीस अलग रहती है। यहां तक कि सलमान-शाहरुख और अमिताभ बच्चन जैसे सेलिब्रिटीज को भी इसकी मेंबरशिप नहीं मिली पाई है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस क्लब में से लोकसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को बाहर निकाला जा चुका है। आइए जानते हैं इस क्लब में ऐसा क्या-क्या मिलता है।
किसने उठाया सवाल?
आरपीजी ग्रुप के चेयरमैन Harsh Goenka ने 26 मई 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर क्लब की व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि "मुंबई हमेशा बराबरी और विकास की बात करता है, लेकिन कुछ दशक पहले तक ब्रीच कैंडी क्लब में भारतीयों को मेंबरशिप तक नहीं दी जाती थी। आज भी कोई भारतीय इसकी ट्रस्ट कमेटी का हिस्सा नहीं बन सकता। केवल मुंबई में रहने वाला कोई यूरोपीय ही ट्रस्ट कमेटी में शामिल हो सकता है। जिस जमीन पर क्लब बना है, वह महाराष्ट्र सरकार की जमीन है।"

क्यों चर्चा में है ब्रीच कैंडी क्लब?
दिल्ली जिमखाना क्लब पर चल रही बहस के बीच ब्रीच कैंडी क्लब इसलिए चर्चा में है क्योंकि यहां आज भी शक्ति और नियंत्रण यूरोपीय सदस्यों के हाथों में केंद्रित माना जाता है। “ब्रीच कैंडी स्विमिंग बाथ ट्रस्ट” के नाम से पहचाना जाने वाला यह क्लब 1800 के दशक से अपनी कॉलोनियल पहचान बनाए हुए है।
कैसे हुई क्लब की शुरुआत?
इस क्लब की स्थापना साल 1878 में हुई थी। इसकी शुरुआत स्वेज नहर खुलने से जुड़ी हुई मानी जाती है। स्वेज नहर खुलने से पहले बॉम्बे में रहने वाले यूरोपीय लोग लंबी समुद्री यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए अदन में एक हॉस्टल चलाते थे। लेकिन नहर खुलने के बाद उस हॉस्टल की जरूरत खत्म हो गई।
इसके बाद उस संपत्ति को लगभग ₹7,300 में बेच दिया गया। इसी पैसे से बॉम्बे में खारे पानी वाला स्विमिंग पूल बनाया गया। उस समय भारत के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने समुद्र किनारे करीब पांच एकड़ जमीन इसके लिए दी थी।
ऐसा क्या है क्लब में?
जब क्लब शुरू हुआ था, तब ब्रीच कैंडी इलाका आज जितना पॉश नहीं था। लेकिन समय के साथ यह जगह एक्सक्लूसिव लाइफस्टाइल और एलीट स्टेटस का प्रतीक बन गई। क्लब में स्विमिंग पूल, रेस्टोरेंट, जिम, रीडिंग रूम और कई स्पोर्ट्स सुविधाएं जोड़ी गईं। इसका आउटडोर पूल ब्रिटिश इंडिया के नक्शे के आकार में बनाया गया है।
आजादी के बाद भी भारतीयों की एंट्री पर रोक
ब्रीच कैंडी क्लब लंबे समय तक केवल यूरोपीय लोगों के लिए ही खुला रहा। भारतीयों को मेंबरशिप नहीं दी जाती थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि 1947 में भारत की आजादी के बाद भी यह प्रतिबंध जारी रहा।
1960 में शुरू हुआ बड़ा विवाद
साल 1960 में क्लब की नस्लीय नीतियों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। एक अश्वेत अमेरिकी राजनयिक को क्लब में एंट्री देने से मना कर दिया गया था। इस घटना के बाद क्लब की नीतियों की काफी आलोचना हुई और उस पर दबाव बढ़ा।
भारतीयों के लिए दरवाजे खुले, सिर्फ आने-जाने के लिए
विवाद बढ़ने के बाद क्लब ने भारतीयों के लिए मेंबरशिप खोल दी, लेकिन पूरी शक्ति और नियंत्रण अब भी सीमित ही रहा। 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सदस्यों को क्लब के वोटिंग अधिकार या प्रबंधन में बराबरी की शक्ति नहीं दी गई थी। आज भी क्लब का संचालन आम भारतीयों की पहुंच से काफी दूर माना जाता है।
कितने की पड़ती है मेंबरशिप?
ब्रीच कैंडी क्लब अपनी एक्सक्लूसिव मेंबरशिप के लिए भी जाना जाता है। 2013 की एक रिपोर्ट के मुताबिके, लगभग 15 साल बाद क्लब ने नई मेंबरशिप शुरू की थी। इसके बाद लोगों में सदस्य बनने की होड़ लग गई और कई लोगों को एक साल तक वेटिंग लिस्ट में रहना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक उस समय मेंबरशिप फीस लगभग ₹1 करोड़ थी। इसके ऊपर 12.36 प्रतिशत सर्विस टैक्स जोड़ने के बाद कुल लागत करीब ₹1.12 करोड़ पहुंच गई थी। इसके अलावा सदस्यों को हर साल लगभग ₹15,000 सालाना फीस भी देना पड़ता था।
15 साल इंतजार के बाद मिली मेंबरशिप
मुंबई के डेवलपर Pujit Agrawal ने 2013 में मीडिया बताया था कि उन्होंने करीब 15-16 साल पहले मेंबरशिप के लिए आवेदन किया था और लंबे इंतजार के बाद उन्हें क्लब की मेंबरशिप मिली। उन्होंने कहा कि मुंबई में खुले मैदान और स्पोर्ट्स सुविधाएं कम हैं, इसलिए ऐसे क्लब लोगों के लिए आकर्षण बने रहते हैं।
शशि थरूर के साथ भी हुआ था भेदभाव
क्लब उस समय भी विवादों में आया था जब कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor को बचपन में यहां से बाहर निकाल दिया गया था। अपनी किताब The Elephant, The Tiger and The Cellphone में थरूर ने लिखा कि उन्हें सिर्फ भारतीय होने की वजह से ब्रीच कैंडी स्विमिंग पूल से बाहर कर दिया गया था।
उन्होंने बताया कि यह घटना 1960 के दशक के मध्य की है, जब वह अपने एक अमेरिकी दोस्त के साथ वहां गए थे। उनके अमेरिकी दोस्त को अंदाजा भी नहीं था कि भारत में ऐसा भेदभाव हो सकता है। थरूर ने लिखा कि यह भारत की आजादी के करीब 20 साल बाद की बात थी, लेकिन तब भी वहां “सिर्फ गोरे लोगों” वाली मानसिकता मौजूद थी।
आज भी यूरोपीय ट्रस्ट के हाथ में कंट्रोल
आज भी क्लब के अहम फैसलों का अधिकार यूरोपीय ट्रस्ट सदस्यों के छोटे समूह के पास माना जाता है। क्रिटिक्स का कहना है कि आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत में ऐसी व्यवस्थाएं बराबरी और एक समान अधिकारी की भावना के खिलाफ जाती हैं।
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