Obsess Movie Review: 'ऑब्सेस' में रोडरेज की कहानी, बहुत कम डायलॉग, फिल्म का ट्रीटमेंट अनोखा, पढ़ें रिव्यू

फिल्म: ऑब्सेस (Obsess)
स्टारकास्ट: पीटर विल्सन, ईशा सिंह
डायरेक्टर: पीटर विल्सन
रन टाइम: 2 घंटे 18 मिनट
स्टार: 3 (***)

Obsess Movie Review: बॉलीवुड में नए प्रयोग वाली फिल्म हमेशा दर्शकों की पसंद रही हैं। इस फेहरिस्त में क्राइम थ्रिलर ऑब्सेस शामिल हो गई है, जिसकी कहानी सिर्फ दो किरदारों की है, जो मानसिक रूप से अस्थिर हैं। इस फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू क्या है, आइए जानते है।

Obsess Movie Review

क्या है फिल्म 'ऑब्सेस' की कहानी?
फिल्म 'ऑब्सेस' की कहानी नॉर्थ इंडिया के किसी शहर से शुरू होती है। अंधेरी रात में एक सुनसान घर के भीतर पीटर (पीटर विल्सन) किसी की हत्या करता है। वह मानसिक रूप से बेहद अस्थिर इंसान है। हत्या के बाद वह बाहर आकर अपने ट्रक में बैठ जाता है और खुद से कहता है कि वह गलत नहीं बल्कि कमजोर है लेकिन हारा हुआ नहीं है। भारी तनाव में वह दवाइयां खाता है और फिर शराब पीने लगता है।

मानसिक रूप से अस्थिर है पीटर

-इसी बीच पीटर के बॉस का मैसेज आता है कि शराब पीकर गाड़ी चलाने की चेतावनी न मानने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया है। बॉस के अपमानजनक मैसेज पढ़कर पीटर और भड़क जाता है। वह ट्रक लेकर सीधे अपने बॉस के घर पहुंचता है और बेरहमी से उसकी हत्या कर देता है।

-इसके बाद पीटर चर्च पहुंचता है। वह कन्फेशन बॉक्स में फादर के सामने एक महिला की हत्या का अपराध स्वीकार करता है लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि कुछ ही देर बाद वह फादर की भी हत्या कर देता है। उसका कहना है कि उसे अब किसी पर भरोसा नहीं रहा।

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-दूसरी तरफ सारा (ईशा सिंह) की अपनी पति से अनबन चल रही है। वह फोन पर साफ कहती है कि वह अपने पति को बच्चे की कस्टडी नहीं देगी और उससे दूरी बनाए रखना चाहती है। सारा अपने बेटे सचिन को लेकर मां के घर के लिए निकलती है। रास्ते में सड़क निर्माण के कारण उसे कार रोकनी पड़ती है। वह पीछे की सीट पर बैठे बच्चे को संभालने के लिए कार से उतरती है।

-उसी समय पीछे खड़ा पीटर, जो नशे में धुत है, लगातार हॉर्न बजाने लगता है। परेशान होकर सारा उसके ट्रक तक पहुंचती है और उसे डांटते हुए बदतमीज कहती है। पीटर बस उसे घूरता रहता है।

-यहीं से शुरू होती है एक खतरनाक कहानी। एक तरफ है घमंडी और लड़ाकू स्वभाव की सारा तो दूसरी तरफ मानसिक रूप से विक्षिप्त पीटर है। इन दोनों की टक्कर में सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है मासूम सचिन को। एक सायको किलर और अपने बच्चे के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार मां के बीच की ये लड़ाई दर्शकों को सांस रोक देने वाला अनुभव देती है।

फिल्म का दमदार डायरेक्शन

-सिर्फ दो मुख्य किरदारों पर आधारित फीचर फिल्म बनाना आसान काम नहीं है लेकिन निर्देशक पीटर विल्सन इसे बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश करते हैं। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है पीटर के सायकोलॉजिकल व्यवहार को बहुत ही नैचुरल तरीके से दिखाना। उसे लगता है कि दुनिया उसके साथ गलत करती है और गलत लोगों को सजा देना ही सही रास्ता है।

-दूसरी तरफ निर्देशक सारा के अंदर के अहंकार और आक्रामक स्वभाव को भी बखूबी दिखाते हैं। वह अपने पति से अलग होने के बाद किसी तरह का रिश्ता नहीं रखना चाहती और अपने बेटे को सिर्फ अपना मानती है। इन दोनों जटिल मानसिकताओं के टकराव को निर्देशक ने पूरे 2 घंटे 18 मिनट तक दिलचस्प बनाए रखा है। बेहद कम संवादों के बावजूद फिल्म कहीं भी बोर नहीं करती। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।

फिल्म की स्टारकास्ट और उनका शानदार अभिनय

-फिल्म ऑब्सेस में सिर्फ दो प्रमुख किरदार हैं लेकिन दोनों ही बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। मानसिक रूप से अस्थिर पीटर के किरदार में पीटर विल्सन का अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है। समाज द्वारा खुद को लूजर समझे जाने का दर्द उन्होंने चेहरे के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से शानदार तरीके से व्यक्त किया है।

-फिल्म में डायलॉग बहुत कम हैं, इसलिए कहानी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी एक्टर्स के एक्सप्रेशंस पर टिकी है और यहां पीटर विल्सन पूरी तरह सफल रहते हैं। एक सायको किलर के रूप में उनका अभिनय डर भी पैदा करता है और किरदार के दर्द को महसूस भी कराता है।

-वहीं अपने पति से लड़ने वाली और एगोस्टिक सारा के किरदार में ईशा सिंह भी प्रभावित करती हैं। वह एक इंडिपेंडेंट महिला है, जो सड़क पर बदतमीजी कर रहे पीटर को डांटने से बिल्कुल नहीं डरती लेकिन जब वही आदमी उसके बच्चे का अपहरण करता है, तब एक मां का डर, बेचैनी और असहायता ईशा के अभिनय में बेहद स्वाभाविक लगती है।

-पीटर विल्सन और ईशा सिंह के फेस-ऑफ वाले दृश्यों में लगभग कोई संवाद नहीं हैं लेकिन दोनों कलाकार अपनी परफॉर्मेंस से दर्शकों को कहानी से बांधे रखते हैं। दोनों ने बेहद उम्दा काम किया है।

क्यों देखें फिल्म 'ऑब्सेस'?

-फिल्म 'ऑब्सेस' की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये लगभग बिना संवादों के भी एक जटिल कहानी को बेहद थ्रिलिंग तरीके से प्रस्तुत करती है। सारा के बच्चे के अपहरण के बाद वाले चेज और टकराव के दृश्य बेहद डरावने और तनावपूर्ण बन पड़े हैं।

-बतौर दर्शक आप कहानी से जुड़ जाते हैं और बार-बार यही सोचते हैं कि आखिर सारा को उस सायको किलर से उलझने की जरूरत ही क्या थी। यहीं फिल्म का ड्रामा वास्तविक लगने लगता है। सड़क पर होने वाली छोटी-छोटी बहसें किस तरह खतरनाक मोड़ ले सकती हैं, फिल्म उसी डरावने सच को दिखाती है।

-रेगुलर कमर्शियल सिनेमा से अलग, ये एक एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजिकल थ्रिलर है, जो अपने दोनों किरदारों के माध्यम से एक जरूरी संदेश भी देती है। गुस्सा एक पल में खत्म हो सकता है लेकिन एक लापरवाही भरा फैसला जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकता है। 'ऑब्सेस' इंडियन सिनेमा में एक अलग और साहसी अध्याय जोड़ती है। ये ऐसी थ्रिलिंग फिल्म है, जो लंबे समय तक दर्शकों के जहन में बनी रहती है।

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