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Lohri 2026: क्या है 'लोहड़ी' का मतलब? कौन थे दुल्ला भट्टी? जानें कथा

Lohri 2026: पूरा देश 'लोहड़ी' के जश्न में सराबोर है। फसल की कटाई के जश्न के तौर पर मनाए जाने वाले इस त्योहार के लिए घरों में तैयारिया हो रही हैं, लोग लकड़ियां, गोहा, तिल और रेवड़ी लेकर जश्न की तैयारियों में जुटे हैं। लोहड़ी की संध्या पर घरों और मोहल्लों में अलाव जलाया जाता है। लोग अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, पॉपकॉर्न और गन्ना अग्नि में अर्पित करते हैं।

इसे अग्नि देव को धन्यवाद देने और समृद्धि की कामना का प्रतीक माना जाता है।आपको बता दें कि 'लोहड़ी' का अर्थ ही है 'लोह' (अग्नि), 'गोहा' (गोबर के उपले), और 'रेवड़ी' (मिठाई), इसलिए इसकी पूजा में इन चीजों का प्रयोग होता है लेकिन ये त्योहार तब तक अधूरा है, जब तक 'दुल्ला भट्टी' की कथा ना सुनाई जाए।

मालूम हो कि लोकगीतों, कथाओं और परंपराओं में बसे दुल्ला भट्टी केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले लोकनायक और नारी सम्मान के प्रतीक हैं।

Lohri 2026: कौन थे दुल्ला भट्टी?

दुल्ला भट्टी का पूरा नाम राय अब्दुल्ला भट्टी था जो कि 16वीं शताब्दी में पंजाब क्षेत्र में पैदा हुए थे, जब मुगल सम्राट अकबर का शासन था। उनके पिता और दादा को मुगलों के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने के कारण फांसी दे दी गई थी। दुल्ला भट्टी को पंजाब का रॉबिन हुड भी कहा जाता है। वे अन्याय, कर वसूली और महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ हमेशा खड़े रहे।

Lohri 2026: सुंदरी-मुंदरी की कथा

सुंदरी और मुंदरी नाम की दो बहनें थीं, जिन्हें कि अमीरों को बेचा गया था लेकिन दुल्ला भट्टी ने उन्हें आजाद करवाया और उनकी शादी सम्मानपूर्वक करवाई, दुल्ला भट्टी ने खुद बेटियों का कन्यादान किया और दहेज में केवल शक्कर और तिल दिए। यही कारण है कि लोहड़ी के गीतों में आज भी गाया जाता है- 'सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो... दुल्ला भट्टी वाला हो।' उन्हें लोक देवता की तरह पूजा जाता है।

Lohri 2026: ''लोहड़ी' के पारंपरिक व्यंजन

'लोहिड़ी' पर सरसों का साग, मक्के की रोटी, तिल के लड्डू, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी विशेष रूप से खाए जाते हैं। ये खाद्य पदार्थ सर्दी में शरीर को गर्म रखने और ऊर्जा देने वाले माने जाते हैं।

Lohri 2026: सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं बल्कि आपसी भाईचारे और सामूहिक आनंद का प्रतीक है। यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह उनकी मेहनत और आने वाली अच्छी फसल की खुशी को दर्शाता है। लोग पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को बधाइयां देते हैं और खुशियां साझा करते हैं।

DISCLAIMER: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है इसलिए किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृपया किसी जानकार ज्योतिष या पंडित की राय जरूर लें।

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