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क्‍यों पूजे जाते हैं दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश एकसाथ

laxmi and ganesh
दीवाली भारत का अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक पर्व है। इस दिन हम धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक और बुद्धि के देवता भगवान गणेश की पूजा करते हैं। यह हम सब भली भांती जानते हैं कि कोई भी शुभ कार्य गणेश पूजन के बगैर कभी पूरा नहीं होता। गणेश जी बुद्धि प्रदाता हैं। वे विघ्न विनाशक और विघ्नेश्वर हैं। यदि व्यक्ति के पास खूब धन-सम्पदा है और बुद्धि का अभाव है तो वह उसका सदुपयोग नहीं कर पायेगा। अतः व्यक्ति का बुद्धिमान और विवेक होना भी आवश्यक है।

तभी धन के महत्व को समझा जा सकता है। गणेश का विशाल उदर अधिक सम्पदा का प्रतीक है। और सूँढ कुशाग्र बुद्धि का प्रतीक है। साथ ही इनकी पूजा करने से संकटों का नाश भी होता है। गणेश लक्ष्मी की एक साथ पूजा व दोनों की कृपा के महत्त्व को कई कहानियों के माध्यम से बताया गया है। पौराणिक ग्रन्थों में एक कथा में प्रमाण मिलता है कि लक्ष्मी जी की पूजा गणेश जी के साथ क्यों होती है। आइये जाने कि ऐसा क्यों होता है।

एक बार एक वैरागी साधु को राज सुख भोगने की लालसा हुई उसने लक्ष्मी जी की आराधना की। उसकी आराधना से लक्ष्मी जी प्रसन्न हुईं तथा उसे साक्षात दर्शन देकर वरदान दिया कि उसे उच्च पद और सम्मान प्राप्त होगा। दूसरे दिन वह वैरागी साधु राज दरवार में पहुचा। वरदान मिलने से उसे अभिमान हो गया। उसने राजा को धक्का मारा जिससे राजा का मुकुट नीचे गिर गया। राजा व उसके दरबारीगण उसे मारने के लिए दौड़े। परन्तु इसी बीच राजा के गिरे हुए मुकुट से एक काला नाग निकल कर भागने लगा।

सभी चैंक गये और साधु को चमत्कारी समझकर उस की जय जयकार करने लगे। राजा ने प्रसन्न होकर साधु को मंत्री बना दिया। क्योंकि उसी के कारण राजा की जान बची थी। साधु को रहने के लिए अलग से महल दिया गया वह शान से रहने लगा। राजा को एक दिन वह साधु भरे दरवार से हाथ खीचकर बाहर ले गया। यह देख दरबारी जन भी पीछे भागे। सभी के बाहर जाते ही भूकंप आया और भवन खण्डहर में तब्दील हो गया। उसी साधु ने सबकी जान बचाई। अतः साधु का मान-सम्मान बढ़ गया। जिससे उसमें अहंकार की भावना विकसित हो गयी।

राजा के महल में एक गणेश जी की प्रतिमा थी। एक दिन साधु ने वह प्रतिमा यह कह कर वहाँ से हटवा दी कि यह प्रतिमा देखन में बिल्‍कुल अच्छी नहीं है। साधु के इस कार्य से गणेश जी रुष्ठ हो गये। उसी दिन से उस मंत्री बने साधु की बुद्धि बिगड़ गई वह उल्टा पुल्टा करने लगा। तभी राजा ने उस साधू से नाराज होकर उसे कारागार में डाल दिया। साधू जेल में पुनः लक्ष्मीजी की आराधना करने लगा। लक्ष्मी जी ने दर्शन दे कर उससे कहा कि तुमने गणेश जी का अपमान किया है। अतः गणेश जी की आराधना करके उन्हें प्रसन्न करों।

लक्ष्मीजी का आदेश पाकर वह गणेश जी की आराधना करने लगा। इससे गणेश जी का क्रोध शान्त हो गया। गणेश जी ने राजा के स्वप्न में आ कर कहा कि साधु को पुनः मंत्री बनाया जाये। राजा ने गणेश जी के आदेश का पालन किया और साधु को मंत्री पद देकर सुशोभित किया। इस प्रकार लक्ष्मीजी और गणेश जी की पूजा साथ-साथ होने लगी। बुद्धि के देवता गणेश जी की भी उपासना लक्ष्मीजी के साथ अवश्य करनी चाहिए क्योंकि यदि लक्ष्मीजी आ भी जाये तो बुद्धि के उपयोग के बिना उन्हें रोक पाना मुश्किल है।

इस प्रकार दीपावली की रात्रि में लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की भी आराधना की जाती है। पूजाकर्ता को अपनी बाईं ओर लक्ष्मी एवं दाईं ओर गणेश रखने चाहिए। लक्ष्मी-गणेश जी की इस रूप में पूजा से आप प्राप्‍त धन की विपत्ति के बिना एवं बुद्धि के साथ संभालकर उसका उपयोग कर पायेंगे अन्यथा अकेली लक्ष्मी के आने से मनुष्य अहंकार में डूब जाएगा और धन को व्यर्थ खर्च में उड़ा देगा। विवेक होने पर ही तो वह लक्ष्मी का महत्त्व समझेगा, रोकेगा और उसकी वृद्धि करेगा।

पार्थिव पूजन का विशेष महत्व

धर्मशास्त्रों में भी पार्थिव पूजन का विशेष महत्व वर्णित है। इस पार्थिव पूजन या मिट्टी की प्रतिमाओं के पीछे यह रहस्य छिपा है कि इससे अमीर और गरीब का अन्तर मिटता है। सभी में समभाव की भावना का विकास होता है। और यह शुद्ध व पवित्र भी मानी जाती हैं। अतः दीपावली पर मिट्टी की प्रतिमा से ही लक्ष्मी जी व गणेश जी का विधिवत पूजन व अर्चन करना चाहिए जिससे धन सपंदा व ऐश्वर्य के साथ-साथ बुद्धि का भी विकास हो।

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