नहीं रहे मशहूर साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल, शोक में डूबा साहित्य क्षेत्र

Shrilal Shukla
लखनऊ। साहित्य क्षेत्र के लिए एक बुरी खबर है। मशहूर व्यंग्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल का आज लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने आज लखनऊ के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह 86 वर्ष के थे। यूपी के अलीगढ़ में साल 1925 में जन्में श्री लाल शुक्ला को देश के वरिष्ठ और विशिष्ठ साहित्यकारों में गिना जाता रहा है। उन्हें उनके प्रसिद्ध उपन्यास रागदरबारी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस पुस्तक का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

श्री शुक्ल काफी समय से बीमार चल रहे थे। शुक्ल को साल 2008 में को पद्मभूषण पुरस्कार नवाजा गया था। उनके निधन पर के साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है। साहित्कारों ने कहा कि उनकी कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता है। व्यंग्य पर इतनी अच्छी पकड़ हर किसी के बस की बात नहीं है। उनका अंतिम संस्कार यहां स्थानीय निगम बोध घाट पर दोपहर ढाई बजे होगा।

1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त कर उन्होंने 1949 में राज्य सिविल सेवा में अपनी नौकरी शुरू की और 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश ग्रहण किया था। तीस से अधिक पुस्तकों के लेखक श्रीलाल शुक्ल के निधन पर भारतीय ज्ञानपीठ, जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ ने गहरा शोक व्यक्त किया है।

शुक्ल का पहला उपन्यास 1957 में 'सूनी घाटी का सूरज'छपा था और उनका पहला व्यंग्य संग्रह 'अंगद का पांव' 1958 में छपा था। उन्हें 1969 में राग दरबारी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। महज 34 वर्ष की उम्र में ही इस उपन्यास ने उन्हें हिन्दी साहित्य में अमर बना दिया। वह अकादमी का पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के सबसे कम उम्र के लेखक हैं। राग दरबारी का अनुवाद अंग्रेजी के अलगावा 15 भारतीय भाषाओं में हो चुका है।

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