Indira Ekadashi 2022: पितरों को मोक्ष और अग्रजों को सुख प्रदान करती है 'इंदिरा एकादशी'

नई दिल्ली, 15 सितंबर। आश्विन मास के प्रथम 15 दिवस पितरों के दिन होते हैं जिन्हें पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष कहते हैं। इस अवधि में आने वाली एकादशी का बड़ा महत्व है। एकादशी को वैसे भी मोक्ष प्रदायिका कहा गया है और जब यह पितृपक्ष में आती है तो इसका महत्व बहुत बढ़ जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों का कथन है किजो व्यक्ति इंदिरा एकादशी का व्रत करता है वह पितरों को संतुष्ट कर उन्हें मोक्ष प्रदान करता है साथ ही व्रत करने वाला मनुष्य भी पृथ्वी पर रहते हुए समस्त सुखों का भोग करता है और मृत्युउपरांत भगवान विष्णु के बैकुंठ लोक को प्राप्त करता है।

 Indira Ekadashi 2022: पितरों को मोक्ष और अग्रजों को सुख प्रदान करती है इंदिरा एकादशी

इंदिरा एकादशी का व्रत रखकर जो मनुष्य इसका पुण्यफल पितरों को प्रदान करता है तो इससे पितरों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। इंदिरा एकादशी 21 सितंबर 2022 बुधवार को आ रही है। इस दिन भगवान विष्णु को कलाकंद अथवा मावे की मिठाई का नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। इन्हीं पदार्थो से पितरों के निमित्त धूप देने से वे संतुष्ट होकर अच्छे आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

इंदिरा एकादशी व्रत विधि

इंदिरा एकादशी के एक दिन पूर्व अथवा दशमी के दिन व्रती एक समय भोजन करें। रात्रि में भोजन न करें और अच्छे से दंत धावन करें। एकादशी के दिन सूर्योदय पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाए। शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण कर पंच देवों का पूजन करें। फिर एकादशी व्रत का सकाम या निष्काम संकल्प लेकर भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप का पूजन करें। एकादशी व्रत की कथा सुनें। दिनभर निराहार रहें। द्वादशी के दिन प्रात: व्रत का पारण करें। किसी ब्राह्मण दंपती को भोजन करवाकर अथवा भोजन बनाने का सामान देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें फिर व्रत खोलें। यदि एकादशी का पुण्य पितरों को देना चाहते हैं तो संकल्प के समय इसका उच्चारण करें।

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

सतयुग में महिष्मती नाम की नगरी में राजा इंद्रसेन राज करते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे और उनकी प्रजा सुखी थी। एक दिन नारदजी इंद्रसेन के दरबार में पहुंचे। उन्होंने राजा इंद्रसेन से कहा कितुम्हारे पिता का संदेश लेकर आया हूं जो इस समय पूर्व जन्म में एकादशी का व्रत भंग होने के कारण यमराज का दंड भोग रहे हैं। नारदजी के मुख से पिता की पीड़ा सुनकर इंद्रसेन दुखी हो जाए और पिता के मोक्ष का उपाय पूछा। नारदजी ने कहा आश्विन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का व्रत करने का निर्देश दिया। राजा इंद्रसेन ने नारदजी की बताई विधि अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य फल पिता को प्रदान किया। व्रत के प्रभाव से इंद्रसेन के पिता को मुक्ति मिली और वे बैकुंठ लोक चले गए।

एकादशी तिथि

  • प्रारंभ : 20 सितंबर रात्रि 9.28 से
  • संपूर्ण : 21 सितंबर रात्रि 11.35
  • पारण : 22 सितंबर प्रात: 6.15 से 8.41

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