Goa Stampede News: क्या है श्री लैराई जात्रा, जहां मची भगदड़ ने ली 6 लोगों की जान, जानिए इसका धार्मिक महत्तव

Goa Stampede News: गोवा में श्री लैराई जात्रा के दौरान मची भगदड़ में 6 लोगों के मरने की खबर आ रही है। इस हादसे में 40 से ज्यादा लोग घायल हैं जिनमें 20 की हालत गंभीर बताई जा रही है। ये हादसा शुक्रवार की रात को ही हुआ जिसकी जानकारी शनिवार को सुबह मिली। अब तक मिल रही जानकारी के मुताबिक, मृतकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो सकती है।

खबरों की मानें तो शुक्रवार को गोवा के शिरगांव में श्री लैराई जात्रा के लिए भारी संख्या में श्रद्धालुओं मंदिर की ओर जा रहे थे। इस दौरान बिजली के करंट लगने से कुछ लोग गिर गए जिससे लोग इधर-उधर भागने लगे। इससे वहां पर भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई।

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क्या है श्री लैराई जात्रा और इसका धार्मिक महत्तव क्या है? आईए विस्तार से जानते हैं....

Goa Stampede News: क्या है श्री लैराई जात्रा

श्री लैराई यात्रा जिसे स्थानीय लोग जात्रा कहते हैं केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि गोवा की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। पश्चिमी तट पर बसे गोवा की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता अपने आप में अनोखी है। यह एक आध्यात्मिक उत्सव है जिसे हर साल अप्रैल या मई के महीने में मनाया जाता है।

उत्तर गोवा के बिचोलिम तालुका स्थित शिरगांव गांव में बड़े श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें गोवा, महाराष्ट्र और कर्नाटक से हजारों की संख्या में श्रद्धालु शिरगांव पहुंचते हैं। यह यात्रा देवी लैराई के प्रति आस्था, साहस और सामाजिक एकता की मिसाल है और गोवा की गहरी जड़ें लिए धार्मिक संस्कृति की झलक भी प्रस्तुत करती है।

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी लैराई सप्तमातृकाओं में से एक हैं। सप्तमातृका यानि सात मातृ शक्तियां, जिनमें लैराई के अलावा केलबाई, महामाया, मिराबाई, मोरजाई, शीतलई और अंजदीपा देवी शामिल हैं। पौराणिक कथाओं में इन सभी को भाई खेतोबा के साथ चोरला घाट के रास्ते गोवा में प्रवेश करते हुए दर्शाया गया है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार देवी लैराई ने शिरगांव को अपना स्थायी निवास चुना और तब से वे वहां के लोगों के साथ-साथ संसाधनों की रक्षा करती हैं। गांव की समृद्धि, सुरक्षा और सांस्कृतिक चेतना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

Goa Stampede News: अग्निपथ पर चल कर लोग देते हैं आस्था की परीक्षा

श्री लैराई जात्रा में कठीन'अग्निदिव्य' रस्म होती है जो सुबह-सुबह आरंभ होता है। इसमें विशाल होमकुंड या अग्निकुंड में आग जलाई जाती है और जब आग बुझने लगती है तब वही अंगार बिछाए जाते हैं। स्थानीय भाषा में 'धोंड' कहलाने वाले भक्त इस जलते अंगार पर नंगे पांव चलते हैं। यह चलना किसी सामान्य धार्मिक रस्म का हिस्सा नहीं है, बल्कि भक्ति, निष्ठा, साहस और आत्मशुद्धि की चरम परीक्षा होती है।

धोंड भक्त सादा धोती, सिर पर लाल फेटा जैसे पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं और हाथ में 'वेटाची काठी' पवित्र छड़ी होती है। वे देवी लैराई का नाम लेते हुए अत्यंत श्रद्धा और ध्यान से अंगारों पर धीरे-धीरे कदम रखते हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और सच्चे हृदय से अग्निदिव्य करता है, वह बिना किसी शारीरिक हानि के इस अग्निपथ को पार कर लेता है। जबकि जिनके मन में भय, संशय या पाप होता है, वे डरकर तेजी से दौड़ने लगते हैं और ऐसा करना अपशकुन माना जाता है।

कुछ धोंड यह अग्निपरीक्षा एक बार पार करते हैं, तो कुछ कई बार अग्निपथ पर चलते हैं। यह रस्म ना केवल साहसिक है, बल्कि समुदाय की एकता और धर्म के प्रति अडिग आस्था का साक्षात प्रदर्शन भी है।

Goa Stampede News: हिंदू और कैथोलिक सौहार्द

गोवा में श्री लैराई देवी की यात्रा केवल हिंदू आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि यह धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। यहां की एक लोक-मान्यता है कि, लैराई देवी को मापुसा स्थित मिलाग्रेस चर्च की 'सायबिन' वर्जिन मैरी की बहन माना जाता है। यह संबंध प्रतीकात्मक है और इसके आधार पर हिंदू और कैथोलिक समुदायों के बीच गहरा सामाजिक सांस्कृतिक सौहार्द देखा जाता है।

जब लैराई देवी की जात्रा होती है, तब मापुसा के मिलाग्रेस चर्च से मोगरे के फूल भेजे जाते हैं, जबकि जब मिलाग्रेस सायबिन का पर्व आता है, तो लैराई मंदिर से तेल चढ़ावे के रूप में भेजा जाता है। यह परंपरा दोनों धर्मों के बीच परस्पर सम्मान और भाईचारे को दर्शाती है, और इस बात का प्रतीक है कि गोवा की धार्मिक परंपराएं एक-दूसरे में गुंथी हुई हैं।

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